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SHRI KRISHNA JANMASHTAMI : GEETASAR


गीता का केंद्रीय भाव है कि निरंतर कर्म करते रहो, परंतु उसमें आसक्त मत रहो। संस्कार प्राय: मनुष्य की जन्मजात प्रवृत्ति होता है। यदि मन को तालाब मान लिया जाए तो उसमें उठने वाली प्रत्येक लहर, प्रत्येक तरंग जब शांत हो जाती है तब वास्तव में वह नष्ट नहीं होती, वरन चित्त में एक प्रकार का चिह्न छोड़ जाती है। यह तरंग ऐसी संभावना का निर्णय कर जाती है, जिससे वह फिर उठ सके। इस चिह्न तथा इस लहर के फिर से उठने की संभावना को हम संस्कार कह सकते हैं। मैं जो कुछ भी हूं, वह मेरे अतीत के संस्कारों का प्रभाव है। वास्तव में इसे ही चरित्र कहते हैं और प्रत्येक मनुष्य का चरित्र इन संस्कारों के द्वारा ही निर्धारित होता है। शुभ संस्कार प्रबल रहे तो मनुष्य का चरित्र अच्छा होता है और यदि अशुभ संस्कार प्रबल रहे तो बुरा। एक मनुष्य निरंतर बुरे शब्द सुनता रहे, बुरे विचार सोचता रहे, बुरे कर्म करता रहे तो उसका मन भी बुरे संस्कारों से पूर्ण हो जाएगा। हम देखते हैं कि हम जिस किसी कर्म में लिप्त होते हैं, उसका संस्कार हमारे मन में रह जाता है। मैं दिन भर में सैकड़ों आदमियों से मिला। उनमें एक ऐसा व्यक्ति भी है, जिससे मुझे प्रेम है। यदि सोते समय मैं उन सभी का स्मरण करने का प्रयत्न करूं तो मेरे सामने केवल उसी व्यक्ति का चेहरा आएगा, जिसे मैं प्रेम करता हूं। ऐसा इसलिए क्योंकि इस व्यक्ति के प्रति मेरी आसक्ति ने अन्य सभी की अपेक्षा मेरे मन पर गहरा प्रभाव डाल दिया था। 
गीता का सार है -
अनासक्त रहो, कार्य होते रहने दो।
निरंतर कार्य करते रहो, परंतु एक लहर को भी अपने मन पर प्रभाव मत डालने दो।
-- स्वामी विवेकानंद 

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