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INDEPENDENCE DAY SPECIAL 
कब मिलेगी इनसे जादी



                                        70 साल हो गए हमारी जादी को। इतने सालों में क्या सचमुच हमारी गुलामी की जंजीरें टूटी है? क्या हम पराधीनता की वेदना से मुक्त हो आजाद हैं? शायद नहीं ! आज भी हम गुलाम हैं मंहगाई के, गुलाम हैं भ्रष्टाचार के ! भयंकर अट्टहास करते रावण के ये दस सिर यानि गुलामी के के दस चेहरे जिनसे हमें आजाद होना अभी बाकि है।
गरीबी - आजादी के 70 साल बाद भी गरीबी हमारे लिए अभिशाप बना हुआ है। योजनाबद्ध विकास कार्यक्रमों व असीमित धन के आबंटन के बाद भी गरीबी दूर नहीं की जा सकी।
बेरोजगारी - हर साल रोजगार की तलाश में हजारों लोगों का गांव से शहर की ओर पलायन हमारी आजादी को आंखें दिखाने के लिए काफी है। साल दर साल पढ़े-लिखे बेरोजगारों की तैयार होती फ़ौज एक गंभीर चुनौती है।
मंहगाई - सुरसा की भांति निरंतर मुंह फैलाती मंहगाई मध्यम व निम्न वर्ग के लिए आजादी को ठेंगा दिखाने जैसा है। बढ़ती मंहगाई रूपी गुलामी से आजादी आमजन की प्रथम आवश्यकता है।
आतंकवाद - आज आतंकवाद समूचे विश्व व इंसानियत के लिए सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरी है। आतंकवाद फिर से हमें गुलाम बनाने को आतुर है। सरकार को चाहिए आतंकवाद के विरुद्ध कड़ा से कड़ा कदम उठाए। हमें भी देश में अमन व शांति के लिए अपने स्तर पर प्रयास करने होंगे।
साम्प्रदायिकता - यह मानवता को धीरे-धीरे खाने वाला घुन है। अंग्रेजों द्वारा बोया गया साम्प्रदायिकता के बीज आज वृक्ष बनकर फल-फूल रहा है जो कि राष्ट्र की एकता व प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है। धर्म व सम्प्रदाय के नाम पर अपना स्वार्थ साधने वाले राजनीतिक दलों एवं धर्मगुरुओं से स्वयं को आजाद रखने की आवश्यकता है।
आरक्षण - आरक्षण का मुख्य उद्देश्य सामाजिक, शैक्षिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को ऊपर उठाने का था, लेकिन आज यह वोटबैंक की राजनीति तक सिमट कर रह गई है। आरक्षण का वास्तविक लाभ जिनको मिलना चाहिए उन्हें नहीं मिला, बल्कि कुछ प्रभावी जातियों ने अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व की आड़ में इसका जमकर लाभ उठाया।
भ्रष्टाचार - इस शब्द से शायद ही कोई अनजान हो। यह आज राष्ट्र का कोढ़ बन चुका है। सभी इससे त्रस्त हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरुआत स्वयं से करनी होगी। न तो घूस देंगे और न ही लेंगे, इस मूलमंत्र को व्यवहार में लाना होगा।
दुष्कर्म - इसका ग्राफ दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है। मानों किसी के दिल में सजा का खौफ ही न बचा हो। बच्चों और महिलाओं पर हो रहे घिनौने दुष्कर्म के खिलाफ़ आखिर कब बनेगा कठोर कानून। 
भूखमरी - सरकारी गोदामों में टनों अनाज हर साल सड़ जाता है और लोग भूख से मर रहे होते हैं। किसान आत्महत्या करने विवश है। भूमिहीन बढ़ रहे हैं। चारों ओर संसाधनों की भरमार है, पर आम आदमी भूखा मर रहा है। आखिर कब मिलेगी भूखमरी से आजादी ?
असुरक्षा - आज विज्ञान और प्रौद्यिगिकी का अभूतपूर्व विस्तार हुआ है, लेकिन असुरक्षा आम आदमी के लिए अभिशाप बना हुआ है। अकाल, बाढ़ एवं चक्रवात से मुक्ति क्यों नहीं मिल पाई है ?


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