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दिवस विशेष : कबीरदास जयंती - ढ़ाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंड़ित होय
SANT KABIR DAS JAYANTI : KABIR DAS KE DOHE 


                                          कबीर का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा को बचपन में हुआ था। किसी भी प्रकार की विधिवत शिक्षा नहीं लेने के बाद भी कबीर ने भारतीय धर्म दर्शन को जैसा प्रभावित किया, वैसा शायद और कोई नहीं कर सका।
                                         आजीवन सामजिक व्यवस्था की विसंगतियों से जूझता कबीर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर एक सच्चे इंसान के रुप में अपने समय में एक किवदंती बन गये थे।
कबीर समाज सुधारक से बढ़कर व्यक्ति सुधारक थे। यदि व्यक्ति सहज समाधि को पा ले, तो सामाजिक जीवन अपने आप सहज हो जाएगा। वे सामाजिक कुरुतियों, कर्मकांडों, धर्मांधता, जातिवाद आदि पर चुन-चुनकर प्रहार करते हैं। वे बिना किसी भेदभाव के हिंदू और मुसलमान दोनों को जमकर फटकारते हैं। कर्मकांडों की निंदा कर खिल्ली उड़ाते हैं।
                                         कबीर के लिए धर्म था परमात्मा से मिलन की साधना और साधन था सहज योग - 'संतो ! सहज समाधि भली।' कबीर के जीवन दर्शन में दो बातों का महत्वपूर्ण स्थान है, पहला अहंकार का त्याग और दूसरा सत्य के मार्ग पर चलना। अहं और त्याग पर उनकी उक्ति है - " मैं मैं बड़ी बनाई है, सकै तो निकसी भाजि. कब लग राखौ हे सखि रुई लपेटी आगि।"
                                         कबीर हिंदू-मुस्लिम समन्वय का एक अद्वितीय उदाहरण है। कबीर अनपढ़ होने के बाद भी ज्ञानमार्गी हैं। ज्ञानमार्ग पर भी वे पोथी को नहीं प्रेम को ही पढ़ते हैं - "पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय ।
ढ़ाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंड़ित होय ॥"
                                         कबीर धर्मों के बाह्य आडम्बरों का हमेशा विरोध करते थे, क्योंकि कबीर मानते थे कि धर्म का मूल भीतर है और भीतर को शुद्ध रखकर ही बाहर को शुद्ध रखा जा सकता है। कबीर कहते हैं - " दढ़िया बढ़ाई जोगी, हो गई ले बकरा।" यानि दाढ़ी की भीतर की शुद्धता से संबंध होना चाहिए। वे हिंदू भी नहीं थे, मुसलमान भी नहीं थे और दोनों ही थे। अलमस्त, फक्कड़ और अक्कड़ कबीर कहते हैं - " कबीरा खड़ा बाजार में, लिए लुकाठी हाथ। जो घर फूंके आपना, चले हमारे साथ।"
                                           कबीर जिस सनातन तत्व को 'राम' कहकर पुकारते हैं, वह राम उनकी अनुभूति है, भौतिक उपस्थिति नहीं। कबीरदास जी कहते हैं - " मोको कहां ढूढे रे बन्दे मैं तो तेरे पास में. ना मंदिर में ना मस्जिद में ना काबे कैलास में।।"
                                           अपनी झीनी-बीनी-झीनी चदरिया को जतन से ओढ़कर ज्यों की त्यों धर देने वाले कबीर भारतीय ज्ञान और अध्यात्म के ऐसे महान स्तंभ हैं, जिनके व्यक्तित्व की थाह पाना आज भी संभव नहीं हो पाया है। आज जबकि सर्वत्र धर्मांधता, धार्मिक कट्टरता, पाखंड, अंधविश्वास, कर्मकांड और रूढियां आदि तेजी से अपनी जड़ें फैला रही हैं ऐसे समय में कबीर और उनके विचारों की अत्यंत आवश्यकता है। आज पुन: कबीर जैसे महान समाज सुधारक, समन्वयवादी, निष्काम कर्मयोगी संत के आगमन की बेसब्री से प्रतीक्षा है।
-- उमेश कुमार 

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