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5 June : World Environment Day Hindi Article


 पर्यावरण से खिलवाड़ : विकास या विनाश ?
'ग्लोबल वार्मिंग' अब भविष्य की बात नहीं रह गया है, बल्कि इसके परिणाम सामने हैं। जलवायु परिवर्तन व्यापक रुप ले चुका है। ग्लोबल वार्मिंग वैज्ञानिक दुनिया से निकलकर आम इंसान के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। धरती के बढ़ते तापमान से महज ग्लेशियर ही नहीं पिघल रहे हैं, अपितु इससे हम सबकी खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं रहन-सहन भी प्रभावित हो रही है। पूरी दुनिया बाढ़, सूखा, अल्पवर्षा, बर्फबारी, भूस्खलन, तापमान में बढ़ोतरी, भूकंप, विनाशकारी तूफान आदि प्राकृतिक आपदाओं का दंश झेल रहा है।
जलवायु परिवर्तन : भयावह भविष्य की दस्तक
यह सर्वविदित तथ्य है कि वैज्ञानिक एवं तकनीकी विकास ने जहां इंसानी सुख-सुविधाओं व विलासिता के असीमित संसाधन उपलब्ध कराएं हैं, वहीं प्राकृतिक पर्यावरण के साथ अतिशय छेड़छाड़ के कारण जलवायु परिवर्तन ने अब मानवीय अस्तित्व के लिए विनाशक संकेत देना आरंभ कर दिए हैं। धरती इतनी बीमार कभी न थी जितनी आज है। यदि पर्यावरण के विरुद्ध मानवीय गतिविधियां ऐसे ही चलता रहा तो मानव जाति विलुप्ति के कगार पर आ खड़ी होगी।
 धरती मां की बिगड़ती सेहत : दुष्परिणाम सामने 
आज हमारी पहुंच मंगल तक भले ही हो गई है, लेकिन अखिल ब्रह्मांड में अब तक ज्ञात एक मात्र जीवनदायी ग्रह हमारी धरती मां की बिगड़ती सेहत के प्रति क्या हम सचमुच सचेत हैं? धरती का सीना चीरकर हमने तेल और अकार्बनिक पदार्थ निकाल तो लिए, लेकिन इसके दुष्परिणामों को कभी गंभीरता से नहीं लिया। नाभिकीय रिएक्टर लगाकर ईंधन और बम तो बनाए, लेकिन उस पर कारगर नियंत्रण के उपाय नहीं किए गए। उत्पादन बढ़ाने के लिए विभिन्न प्रकार के उर्वरक व कीटनाशक दवाओं का अंधाधुंध प्रयोग तो किया गया लेकिन बंजर होती जमीन और खाद्यान्नों में घुलते धीमे जहर की ओर ध्यान नहीं दिया गया। साल-दर-साल सैकड़ों जंगल उजाड़ तो दिया गया, जीवनदायी नदियों को प्रदूषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ा गया, लेकिन जल संरक्षण एवं पेड़ों को बचाने के प्रयास सिर्फ कागजों तक सीमित रह गया। हमने अपने निजी स्वार्थ के लिए प्रकृति का अतिशय दोहन किया, लेकिन परिणाम पर ध्यान नहीं दिया। हर क्रिया की एक प्रतिक्रिया होती है, हमने प्रकृति पर जो अंतहीन जुल्म किए उसके दुष्परिणामों की लंबी सूची आज हम सबके सामने है।
वैश्विक उच्च तापमान : माह-दर-माह टूटता रिकार्ड
हाल ही में हुए नासा के गोडार्ड इंस्टिट्यूट के अध्ययन के मुताबिक अप्रैल 2016 विगत 136 सालों में सर्वाधिक गर्म महीना था। चौकाने वाली बात यह है कि यह तापमान औसत से 1.11° सेल्सियस अधिक है। इस वर्ष तापमान में हुई वृद्धि ने अब तक के सारे रिकार्ड ध्वस्त कर दिए हैं। अब आप कल्पना कीजिये हम किस भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं। आसमान आग उगल रहा है, सूखे से विश्व में त्राहि-त्राहि मची है। भूगर्भ जलस्तर निरंतर गिर रहा है। तापमान की मामूली वृद्धि से अनेक समस्याएं सामने आई है।
बढ़ती तपिश की घातक होती मार        
वस्तुत: बढ़ते तापमान का मुख्य कारण वातावरण में 'ग्रीन हाउस' गैसों (मुख्यत: कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड आदि) की मात्रा में हो रही वृद्धि है। कोयला, लकड़ी, तेल इत्यादि का उत्पादन, परिवहन तथा उद्योगों, बिजलीघरों में इनका उपयोग, इस असामान्य वृद्धि का कारण है। वैज्ञानिकों के मुताबिक प्रकृति पर मानवीय दखल ऐसे ही चलता रहा तो इस सदी के अंत तक तापमान में 3.6° सेल्सियस की वृद्धि हो सकती है, जिसके भयंकर दुष्परिणाम पूरी दुनिया को भुगतना पड़ेगा। समुद्री जलस्तर में 95 सेंटीमीटर की वृद्धि हो जाएगी, जिससे भारतीय उपमहाद्वीप की लाखों एकड़ उपजाऊ जमीन जलमग्न हो जाएगी। पेड़-पौधे और फसलें प्रभावित होंगी। अनेक जीव-जंतु व वनस्पतियां विलुप्त हो जायेंगे।
पर्यावरण संरक्षण : अब वक्त है संभल जाने का                                                      
अब यह सोचने और बहस का समय नहीं है कि हम इस स्थिति तक कैसे पहुंचे और इसके लिए कौन जिम्मेदार है। 'जब जागो तभी सवेरा', अब वक्त है संभल जाने का। यदि हम सभी संगठित होकर पर्यावरण की सुरक्षा के लिए कार्य करें तो निश्चित रुप प्रकृति भी हमारा साथ देगी। दुनिया के करोड़ों लोग यदि पर्यावरण संरक्षण के प्रति छोटे-छोटे कदम उठाएं तो हमारी धरती पुन: स्वस्थ होकर हरियाली और खुशहाली से मुस्कुराएगी।
--उमेश कुमार साहू 

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