Halloween party ideas 2015

ज्ञान विज्ञान प्रतियोगिता

                      मित्रों 'सफलता सूत्र' आपके लिए लेकर आया है, हिन्दी की पहली 'ज्ञान विज्ञान प्रतियोगिता'।  यहां आप पाएंगे ज्ञान और उपहार का खजाना। यह प्रतियोगिता प्रारंभ करने का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रभाषा हिन्दी का सम्मान व आप सभी का ज्ञान अभिवर्धन करना है। यह प्रतियोगिता उन सभी प्रतिभाशाली मित्रों को प्रोत्साहित करने के लिए है जो इंटरनेट पर समय का सदुपयोग करते हुए अपने ज्ञानकोश में वृद्धि व उपहार प्राप्त करना चाहते हैं।





How to use Bold, Italic and Strikethrough text in Whatsapp Message
व्हाट्सएप पर शब्दों को बनाएं आकर्षक, लिखें बोल्ड व इटैलिक


                                           क्या आप Whatsapp पर अपने लिखे शब्दों को आकर्षक बनाकर या किसी महत्वपूर्ण वाक्य को Highlight करके भेजना चाहते हैं। व्हाट्सएप उपयोगकर्ताओं के लिए व्हाट्सएप में बहुत उपयोगी Features ऐड किया गया है, इसकी सहायता से आप शब्दों को बोल्ड, इटैलिक या स्ट्राइकथ्रू कर भेज सकते हैं। यह बहुत ही आसान है। 
जानिए इस ट्रिक के बारे में -
ऐसे बनाएं टेक्स्ट को बोल्ड, इटैलिक या स्ट्राइकथ्रू
-- बोल्ड Bold - जिस शब्द या वाक्य को बोल्ड करना चाहते हैं उसके शुरू और अंत में स्टार * लगाएं। उदाहरण के लिए यदि आप Welcome को बोल्ड करना चाहते हैं तो  *Welcome* लिखें। Welcome बोल्ड दिखाई पड़ेगा।

--  इटैलिक Italic - जिस शब्द या वाक्य को इटैलिक करना चाहते हैं उसके शुरू और अंत में अंडरस्कोर _ लगाएं। उदाहरण के लिए यदि आप SafaltaSutra को इटैलिक करना चाहते हैं तो  _SafaltaSutra_ लिखें. SafaltaSutra इटैलिक दिखाई पड़ेगा।

-- स्ट्राइकथ्रू Strikethrough - जिस शब्द या वाक्य को स्ट्राइकथ्रू करना चाहते हैं उसके शुरू और अंत में टाईडल ~ लगाएं। उदाहरण के लिए यदि आप Happy को स्ट्राइकथ्रू करना चाहते हैं तो  ~Happy~ लिखें। Happy स्ट्राइकथ्रू दिखाई पड़ेगा।

-- बोल्ड इटैलिक - जिस शब्द या वाक्य को बोल्ड इटैलिक का कॉम्बिनेशन बनाना चाहते हैं उसके शुरू और अंत में  *_ लगाएं।
इसके लिए Whatsapp का v2.12.535 या इससे हायर वर्शन आवश्यक है।

-- ध्यान रहे - जब चिन्हों (*,_,~) का प्रयोग कर रहे हों तो इन चिन्ह और शब्दों के बीच स्पेस न छोड़ें, अन्यथा परिवर्तन नजर नहीं आएगा।


International Yoga Day : 
इन 10 क्रियाओं का अपने जीवन में योग करें और सदा स्वस्थ रहने का द्वार खोलें।


                                            योग का अर्थ है जोड़। वैसे तो योग को अनेक परिभाषाओं से परिभाषित किया गया है। इसके कुछ आध्यात्मिक पहलू हैं तो कुछ मानसिक व शारीरिक। ज्यादा गहराई में न जाते हुए आज की भाग दौड़ भरी जिंदगी के लिए प्रस्तुत हैं कुछ प्रभावी टिप्स, जिन्हें अपनाकर आप अपना शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य अक्षुण्ण बनाए रख सकते हैं।
आइये इन 10 क्रियाओं का अपने जीवन में योग करें और सदा स्वस्थ रहने का द्वार खोलें।

1. सुबह जल्दी उठें - कभी आपने सूर्योदय के सूर्य को निहारा है, गुलाबी आकाश की सुंदरता को मन में उतारा है। पंछियों के कलरव में छुपी संगीत को सुना है। यदि नहीं तो ऐसा करें तन-मन में उमंग का संचार पहले दिन से ही होना शुरू हो जाएगा।

2. उषापान करें - रात को किसी तांबे के पात्र में पानी कुचालक स्थान पर रखें। सुबह अपनी क्षमतानुसार इस जल का सेवन करें। जल सेवन करते समय याद रखें अपना शरीर जमीन से स्पर्श न हो। 10 मिनट इस अवस्था में रहने के बाद यदि शौच लगे तो चले जाएं या थोड़ा टहलें। इस क्रिया के फायदे आपको एक हफ्ते में दिखने लगेगा। पेट संबंधी विकार जैसे गैस, एसीडीटी,कब्ज,सिरदर्द व मुंहासे आदि में आशातीत लाभ मिलने लगेगी।

3. प्रात: भ्रमण करें - जब सूर्योदय हो रहा हो तब प्रात: भ्रमण करें। साफ, स्वच्छ, पेड़ पौधों, फूलों से आच्छादित प्राकृतिक वातावरण में प्रात: भ्रमण करें। भ्रमण करते समय न किसी से बात करें न ही ध्यान कहीं और लगाएं। गहरी-गहरी सांस लेते हुए जल्दी जल्दी चलें। ध्यान सांसों के आने जाने पर लगायें। कल्पना करें वातावरण में व्याप्त दिव्य शक्ति का संचार मेरे तन मन में हो रहा है और दुर्विकारों का शमन हो रहा है। लाभ आप पहले ही दिन से अनुभव करना शुरू कर देंगे।

4. आहार में योग -  स्वास्थ्य के 3 स्तंभ बताये गये हैं - आहार, निद्रा और ब्रम्हचर्य। कहा गया है जैसा खाय अन्न वैसा होय मन। हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में आहार यानि खान पान का बहुत बड़ा योगदान है। हमेशा ताजा व सुपाच्य भोजन लें। दो भोजन के बीच में 6 घंटे का अंतराल जरुर दें। गरिष्ट व तेज मिर्च मसालेदार खाने से बचें। भोजन खूब चबा-चबा कर करें। एक बार बहुत ज्यादा आहार ग्रहण न करें। रात में हल्का भोजन लें। रात का भोजन सोने के 2 घंटे पहले कर लें।

5. जीवन में संगीत का योग करें - संगीत के बिना जीवन की कल्पना नीरस है। मधुर संगीत जहां हमारे तन-मन में नव उमंग व उल्लास का संचार कर देती है, वहीं शारीरिक व मानसिक रोगों में भी संगीत अत्यंत लाभप्रद है। दिन में जब भी समय मिले मधुर संगीत की स्वर लहरियों में अवश्य डूबें, निश्चित रूप से आप जीवन में उमंग उल्लास का संचार महसूस करेंगे।

6. नवीनता का योग करें - जग-जीवन परिवर्तनशील है, इस परिवर्तनशीलता में नवीनता सन्निहित है और नवीनता में जीवन की गति। परिवर्तन को सहजता से स्वीकारें। हमेशा कुछ नया करने को प्रयासरत रहें। याद रखें जो समय के साथ नहीं चलता उसकी स्थिति ठहरे हुए पानी के समान हो जाती है।

7. रचनात्मकता जोड़ें - जीवन में किसी न किसी प्रकार से अपनी रचनात्मकता को जरुर जोड़ें। हर व्यक्ति किसी न किसी रूप से रचनाकार जरुर होता है। लेखन, गायन, पेंटिंग, मूर्तिकला ऐसे न जाने कितने रचनात्मक कार्य हैं जो आपको संतुष्टि के साथ साथ स्वास्थ्य व आय का जरिया  प्रदान कर सकता है।

8. संघर्ष का योग - संघर्ष और सफलता का चोली-दामन का साथ है। हमें संघर्ष से जी चुराना नहीं चाहिए, प्रतिकूल परिस्थितियों से भागना नहीं चाहिए। हम जैसा संघर्ष करते हैं हमारी दशा, परिस्थितियाँ और भाग्य उसी के अनुसार बनते हैं। जीवन में संघर्ष का योग करें और देखें चमत्कार

9. प्रकृति संग सामंजस्य का रिश्ता जोड़े - आप जितना प्रकृति के निकट होंगे हर दृष्टिकोण से अपने आप को स्वस्थ, संतुष्ट व सुखी पाएंगे। प्रकृति के सामीप्य में वो जादू है जो किसी धन दौलत से खरीदी नहीं जा सकती।

10. नींद का योग - आज की भाग-दौड़ भरी जिंदगी में अनिद्रा बड़ी बीमारी बनकर उभरी है। अनिद्रा अपने साथ अनेक बीमारियाँ लेकर आती है। सुखद नींद के लिए रात में जल्दी सोने का आदत डालें। सोते समय समस्त चिंताओं को भूल जाएं। आज बिताए सुखद पलों को याद कर सोएं। सोने का स्थान कोलाहल मुक्त, शुद्ध हवादार व साफ सुथरी रखें। किसी आध्यात्मिक पुस्तक का अध्ययन कर बिस्तर में जाएं।

दिवस विशेष : कबीरदास जयंती - ढ़ाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंड़ित होय
SANT KABIR DAS JAYANTI : KABIR DAS KE DOHE 


                                          कबीर का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा को बचपन में हुआ था। किसी भी प्रकार की विधिवत शिक्षा नहीं लेने के बाद भी कबीर ने भारतीय धर्म दर्शन को जैसा प्रभावित किया, वैसा शायद और कोई नहीं कर सका।
                                         आजीवन सामजिक व्यवस्था की विसंगतियों से जूझता कबीर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर एक सच्चे इंसान के रुप में अपने समय में एक किवदंती बन गये थे।
कबीर समाज सुधारक से बढ़कर व्यक्ति सुधारक थे। यदि व्यक्ति सहज समाधि को पा ले, तो सामाजिक जीवन अपने आप सहज हो जाएगा। वे सामाजिक कुरुतियों, कर्मकांडों, धर्मांधता, जातिवाद आदि पर चुन-चुनकर प्रहार करते हैं। वे बिना किसी भेदभाव के हिंदू और मुसलमान दोनों को जमकर फटकारते हैं। कर्मकांडों की निंदा कर खिल्ली उड़ाते हैं।
                                         कबीर के लिए धर्म था परमात्मा से मिलन की साधना और साधन था सहज योग - 'संतो ! सहज समाधि भली।' कबीर के जीवन दर्शन में दो बातों का महत्वपूर्ण स्थान है, पहला अहंकार का त्याग और दूसरा सत्य के मार्ग पर चलना। अहं और त्याग पर उनकी उक्ति है - " मैं मैं बड़ी बनाई है, सकै तो निकसी भाजि. कब लग राखौ हे सखि रुई लपेटी आगि।"
                                         कबीर हिंदू-मुस्लिम समन्वय का एक अद्वितीय उदाहरण है। कबीर अनपढ़ होने के बाद भी ज्ञानमार्गी हैं। ज्ञानमार्ग पर भी वे पोथी को नहीं प्रेम को ही पढ़ते हैं - "पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय ।
ढ़ाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंड़ित होय ॥"
                                         कबीर धर्मों के बाह्य आडम्बरों का हमेशा विरोध करते थे, क्योंकि कबीर मानते थे कि धर्म का मूल भीतर है और भीतर को शुद्ध रखकर ही बाहर को शुद्ध रखा जा सकता है। कबीर कहते हैं - " दढ़िया बढ़ाई जोगी, हो गई ले बकरा।" यानि दाढ़ी की भीतर की शुद्धता से संबंध होना चाहिए। वे हिंदू भी नहीं थे, मुसलमान भी नहीं थे और दोनों ही थे। अलमस्त, फक्कड़ और अक्कड़ कबीर कहते हैं - " कबीरा खड़ा बाजार में, लिए लुकाठी हाथ। जो घर फूंके आपना, चले हमारे साथ।"
                                           कबीर जिस सनातन तत्व को 'राम' कहकर पुकारते हैं, वह राम उनकी अनुभूति है, भौतिक उपस्थिति नहीं। कबीरदास जी कहते हैं - " मोको कहां ढूढे रे बन्दे मैं तो तेरे पास में. ना मंदिर में ना मस्जिद में ना काबे कैलास में।।"
                                           अपनी झीनी-बीनी-झीनी चदरिया को जतन से ओढ़कर ज्यों की त्यों धर देने वाले कबीर भारतीय ज्ञान और अध्यात्म के ऐसे महान स्तंभ हैं, जिनके व्यक्तित्व की थाह पाना आज भी संभव नहीं हो पाया है। आज जबकि सर्वत्र धर्मांधता, धार्मिक कट्टरता, पाखंड, अंधविश्वास, कर्मकांड और रूढियां आदि तेजी से अपनी जड़ें फैला रही हैं ऐसे समय में कबीर और उनके विचारों की अत्यंत आवश्यकता है। आज पुन: कबीर जैसे महान समाज सुधारक, समन्वयवादी, निष्काम कर्मयोगी संत के आगमन की बेसब्री से प्रतीक्षा है।
-- उमेश कुमार 

 
                           
                               'पिता' दो शब्दों में समाहित सारी कायनात। चाहे वो जीवनदाता के रुप में हो, पालनकर्ता के रुप में हो शिक्षक के रूप में हो या संचालनकर्ता के रुप में हो, पिता हर दृष्टिकोण से महान है। पिता की महानता के बारे में जितना कहा जाय कम है.
                               बचपन में जिसकी उंगलियाँ थाम हम चलना सीखते है, जिसके कांधे में बैठ बचपन का आनंद उठाते है। न जाने कितने हाव-भाव, आचार-विचार हम पिता से सीखते हुए बड़े होते हैं। पिता के संरक्षण में जीवन जीने का मजा ही कुछ और होता है। पिता हर मुश्किल दौर में हमारे साथ होता है.
                               पिता जिसकी बदौलत हम इस दुनिया में आते हैं, जिसकी मदद से हम जीवन में आगे बढ़ते हैं। जो पिता हमारी समस्या का समाधान करने के लिए हर घड़ी तत्पर रहता है। हमारी तकलीफों को दूर करने स्वयं तकलीफों को अनकहे झेल जाता है। हमें पाल-पोष कर बड़ा करने, पढाई-लिखाई से शादी-ब्याह तक की सारी जिम्मेदारी पिता कितने कष्ट उठाकर करता है, इसे कोई पिता ही समझ सकता है।
                               आइये आज पितृ दिवस (
फादर्स डे) के सुअवसर पर संकल्प लें हम हर हाल में पिता का सम्मान करेंगे। उनके हर कष्ट का निवारण करने हमेशा आगे रहेंगे। बुढ़ापे की लाठी बनकर सदा उनका साथ निभाएंगे। क्योंकि एक पिता का कर्तव्य और जिम्मेदारी एक पिता ही समझ सकता है। आज हम अपने पिता के लिए जो भी करेंगे कल हमारे पिता बनने पर वही हमारे साथ किया जायेगा।

-- उमेश कुमार 

पितृ दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएं।

HAPPY FATHERS DAY.


Best Collection of Heart Touching Shayari
Evergreen Hindi Shayari Collection 


शेरो-शायरी का अंदाज सचमुच निराला है। यह अंतरमन की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। शेरो-शायरी के माध्यम से शायर गागर में सागर भर देता है। दर्द, विरह, पीड़ा, तड़प, प्रेम, सौंदर्य, अध्यात्म, आनंद, जीवन क्या कुछ नहीं है शायरी में। जीवन के विविध रूपों को सहजता से पढ़ने व सुनने वालों के हृदय की गहराइयों तक पहुंचाने का सुगम रास्ता है शायरी।
आज मैंने आपके लिए उर्दू के लोकप्रिय शायरों की हजारों शेरों में से कुछ चुनिंदा हृदयस्पर्शी शेरों को संग्रहित किया है। ये शायरी 'देखन में छोटे लगे, घाव भरे गंभीर' कथन को चरितार्थ करते हैं। ये सभी ऐसे पुष्प हैं जो निश्चित रुप से आपके मन की बगिया को महका जाएंगी।

चुनिंदा हृदयस्पर्शी शेरो-शायरी संग्रह (हिन्दी/उर्दू)

न थी हाल की जब हमें अपनी खबर
रहे देखते औरों के ऐबो-हुनर
पड़ी अपनी बुराइयों पे जो नजर
तो निगाह में कोई बुरा न रहा
-- बहादुरशाह 'जफर'

है जान के साथ काम इन्सां के लिए।
बनती नहीं है जिंदगी में, बेकाम किये।
जीते हो तो कुछ कीजिए जिंदों की तरह
मुर्दों की तरह जिए तो क्या ख़ाक जिए।
-- हाली

जो दिल की है, वो बात नहीं होती
जो दिन न हो, वो रात नहीं होती
मिलते तो हैं अक्सर, जमाने से जोश
पर अपने आप से मुलाकात नहीं होती
-- जोश मलीहाबादी


अब इत्र भी मलो तो मोहब्बत की बू नहीं
वो दिन हवा हुए कि जब पसीना गुलाब था
-- माधोराम 'जौहर'

वो जमीं पे जिनका था दबदबा
कि बुलंद अर्श पे नाम था
उन्हें यूं फलक ने मिटा दिया
कि मजार तक का निशां नहीं
-- चकबस्त

मौत तो उसकी है, करे जिसका जमाना अफसोस।
यूं तो दुनिया में सभी आये हैं मरने के लिए।
-- 'महमूद' रामपुरी

जिंदगी के लिए हंसना भी जरूरी है मगर
दिल बुझा हो तो लतीफे अच्छे नहीं लगते
-- वाली आसी

जो चाहिए देखना, न देखा हमने
हर-शै-पे किया है गौर क्या हमने
औरों का समझना तो मुश्किल है
खुद क्या हैं इसी को कुछ न समझा हमने
-- शाद अजीमाबादी

हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम,
वो कत्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता।
-- अकबर इलाहाबादी

इंसान है इस दौर में कुछ इतना परेशां,
भगवान को भगवान के घर ढूंढ़ रहा है।
-- साजन पेशावरी

तुम पास नहीं हो तो अजब हाल है दिल का,
यूं जैसे मैं कुछ रख के कहीं भूल गयी हूं।
-- अदाजाफरी

यह बुतों की मुहब्बत भी क्या चीज है।
दिल्लगी-दिल्लगी में खुद मिल गया।।
-- फना कानपुरी

खत्म होगा न जिंदगी का सफर।
मौत बस रास्ता बदलती है।।
-- साहिल मानिकपुरी

जैसा नजर आता हूं न ऐसा हूं मैं।
और जैसा समझता हूं न वैसा हूं मैं।।
अपने से भी ऐब हूं छुपाता अपने।
बस मुझको ही मालूम है जैसा हूं मैं।।
-- हाली पानीपती

दिल है कदमों पर किसी के सिर झुकाया ही न हो।
बंदगी तो अपनी फितरत है, खुदा हो या न हो।।
यह जनूं भी क्या जनूं, यह हाल भी क्या हाल है।
हम कहे जाते हैं, कोई सुन रहा हो या न हो।।
-- जिगर

मुहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का,
उसी को देखकर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले।
-- मिर्जा ग़ालिब

अपनी तबाहियों का मुझे कोई गम नहीं,
तुमने किसी के साथ मुहब्बत निभा तो दी।
-- साहिर लुधियानवी

जर्रे-जर्रे में तुझे देखा किया
और मैं जर्रा नवाजी क्या करुं।
-- साजन पेशावरी

उजाले अपनी यादों के हमारे पास रहने दो,
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।
-- बशीर बद्र

जहां रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा,
किसी चिराग का अपना मकां नहीं होता।
-- वसीम बरेलवी

सियासत की अपनी अलग इक जुबान है
लिक्खा हो जो इकरार इनकार उसे पढ़ना।
-- बशीर बद्र

उम्रे-दराज मांग के लाए थे चार दिन,
दो आरजू में कट गए दो इंतजार में।
-- बहादुर शाह जफर

लम्हों की कद्र कीजिए वर्ना ये जिंदगी,
यूं ही गुजर न जाए कहीं धूप-छांव में।
-- नासिर सिद्दीकी

इतना सच बोल के होठों का तबस्सुम न बुझे,
रौशनी खत्म न कर आगे अंधेरा होगा।
-- निदा फ़ाज़ली

दुनिया में आदमी को मुश्किल कहां नहीं,
वो कौन सी जमीं है जहां आसमां नहीं।
-- दाग देहलवी

5 June : World Environment Day Hindi Article


 पर्यावरण से खिलवाड़ : विकास या विनाश ?
'ग्लोबल वार्मिंग' अब भविष्य की बात नहीं रह गया है, बल्कि इसके परिणाम सामने हैं। जलवायु परिवर्तन व्यापक रुप ले चुका है। ग्लोबल वार्मिंग वैज्ञानिक दुनिया से निकलकर आम इंसान के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। धरती के बढ़ते तापमान से महज ग्लेशियर ही नहीं पिघल रहे हैं, अपितु इससे हम सबकी खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं रहन-सहन भी प्रभावित हो रही है। पूरी दुनिया बाढ़, सूखा, अल्पवर्षा, बर्फबारी, भूस्खलन, तापमान में बढ़ोतरी, भूकंप, विनाशकारी तूफान आदि प्राकृतिक आपदाओं का दंश झेल रहा है।
जलवायु परिवर्तन : भयावह भविष्य की दस्तक
यह सर्वविदित तथ्य है कि वैज्ञानिक एवं तकनीकी विकास ने जहां इंसानी सुख-सुविधाओं व विलासिता के असीमित संसाधन उपलब्ध कराएं हैं, वहीं प्राकृतिक पर्यावरण के साथ अतिशय छेड़छाड़ के कारण जलवायु परिवर्तन ने अब मानवीय अस्तित्व के लिए विनाशक संकेत देना आरंभ कर दिए हैं। धरती इतनी बीमार कभी न थी जितनी आज है। यदि पर्यावरण के विरुद्ध मानवीय गतिविधियां ऐसे ही चलता रहा तो मानव जाति विलुप्ति के कगार पर आ खड़ी होगी।
 धरती मां की बिगड़ती सेहत : दुष्परिणाम सामने 
आज हमारी पहुंच मंगल तक भले ही हो गई है, लेकिन अखिल ब्रह्मांड में अब तक ज्ञात एक मात्र जीवनदायी ग्रह हमारी धरती मां की बिगड़ती सेहत के प्रति क्या हम सचमुच सचेत हैं? धरती का सीना चीरकर हमने तेल और अकार्बनिक पदार्थ निकाल तो लिए, लेकिन इसके दुष्परिणामों को कभी गंभीरता से नहीं लिया। नाभिकीय रिएक्टर लगाकर ईंधन और बम तो बनाए, लेकिन उस पर कारगर नियंत्रण के उपाय नहीं किए गए। उत्पादन बढ़ाने के लिए विभिन्न प्रकार के उर्वरक व कीटनाशक दवाओं का अंधाधुंध प्रयोग तो किया गया लेकिन बंजर होती जमीन और खाद्यान्नों में घुलते धीमे जहर की ओर ध्यान नहीं दिया गया। साल-दर-साल सैकड़ों जंगल उजाड़ तो दिया गया, जीवनदायी नदियों को प्रदूषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ा गया, लेकिन जल संरक्षण एवं पेड़ों को बचाने के प्रयास सिर्फ कागजों तक सीमित रह गया। हमने अपने निजी स्वार्थ के लिए प्रकृति का अतिशय दोहन किया, लेकिन परिणाम पर ध्यान नहीं दिया। हर क्रिया की एक प्रतिक्रिया होती है, हमने प्रकृति पर जो अंतहीन जुल्म किए उसके दुष्परिणामों की लंबी सूची आज हम सबके सामने है।
वैश्विक उच्च तापमान : माह-दर-माह टूटता रिकार्ड
हाल ही में हुए नासा के गोडार्ड इंस्टिट्यूट के अध्ययन के मुताबिक अप्रैल 2016 विगत 136 सालों में सर्वाधिक गर्म महीना था। चौकाने वाली बात यह है कि यह तापमान औसत से 1.11° सेल्सियस अधिक है। इस वर्ष तापमान में हुई वृद्धि ने अब तक के सारे रिकार्ड ध्वस्त कर दिए हैं। अब आप कल्पना कीजिये हम किस भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं। आसमान आग उगल रहा है, सूखे से विश्व में त्राहि-त्राहि मची है। भूगर्भ जलस्तर निरंतर गिर रहा है। तापमान की मामूली वृद्धि से अनेक समस्याएं सामने आई है।
बढ़ती तपिश की घातक होती मार        
वस्तुत: बढ़ते तापमान का मुख्य कारण वातावरण में 'ग्रीन हाउस' गैसों (मुख्यत: कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड आदि) की मात्रा में हो रही वृद्धि है। कोयला, लकड़ी, तेल इत्यादि का उत्पादन, परिवहन तथा उद्योगों, बिजलीघरों में इनका उपयोग, इस असामान्य वृद्धि का कारण है। वैज्ञानिकों के मुताबिक प्रकृति पर मानवीय दखल ऐसे ही चलता रहा तो इस सदी के अंत तक तापमान में 3.6° सेल्सियस की वृद्धि हो सकती है, जिसके भयंकर दुष्परिणाम पूरी दुनिया को भुगतना पड़ेगा। समुद्री जलस्तर में 95 सेंटीमीटर की वृद्धि हो जाएगी, जिससे भारतीय उपमहाद्वीप की लाखों एकड़ उपजाऊ जमीन जलमग्न हो जाएगी। पेड़-पौधे और फसलें प्रभावित होंगी। अनेक जीव-जंतु व वनस्पतियां विलुप्त हो जायेंगे।
पर्यावरण संरक्षण : अब वक्त है संभल जाने का                                                      
अब यह सोचने और बहस का समय नहीं है कि हम इस स्थिति तक कैसे पहुंचे और इसके लिए कौन जिम्मेदार है। 'जब जागो तभी सवेरा', अब वक्त है संभल जाने का। यदि हम सभी संगठित होकर पर्यावरण की सुरक्षा के लिए कार्य करें तो निश्चित रुप प्रकृति भी हमारा साथ देगी। दुनिया के करोड़ों लोग यदि पर्यावरण संरक्षण के प्रति छोटे-छोटे कदम उठाएं तो हमारी धरती पुन: स्वस्थ होकर हरियाली और खुशहाली से मुस्कुराएगी।
--उमेश कुमार साहू