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लघुकथा - "रंगों की परंपरा"  -- उमेश कुमार
                                              रंगों के पावन पर्व होली की इंद्रधनुषी रंगों से समूचा नीलगगन सराबोर था। नगाड़ों की धमक के साथ जीवन और प्रकृति ताल मिला रहे थे। फगुनाहट बयार संग पकवानों की मीठी सुवास घर-घर तैर रही थी। लेकिन सिद्धार्थ का घर रंगविहीन, नीरवता में डूबा किसी दुःखद घटना का परिचय दे रहा था। आठ महीने पहले सिद्धार्थ के माताजी का स्वर्गवास हो गया था, इसलिए शोकसंतप्त परिवार ने इस साल होली नहीं मनाने का फैसला लिया था।
                                               घर के दोनों बच्चे अपनी समझदारी दिखाते हुए रंग-गुलाल और पिचकारी की जिद छोड़कर गुमसुम बैठे थे। अंदर कमरे में लेटा सिद्धार्थ यादों के ताने-बाने बुन रहा था। उसे मां के साथ बिताए स्वर्णिम पल याद आ रहे थे, उसकी आंखों में आंसुओं का समंदर लहरा रहा था। बचपन से अभी तक मां के साथ मनाई हर होली उसके जीवन के प्रेरक सच्चे रंग थे।
                                               पंद्रह दिन पहले से घर की साफ-सफाई और सजावट में मां जुट जाती थी। हर बार होली से जुड़ी कथा-कहानियां सुनाती। ....सोचते-सोचते सिद्धार्थ की आंखें लग गई। नींद में उसे लगा, मां वहां आकर कह रही हो - '...बेटा आज होली है और तुम उदास...बिना रंगों के ! ...होली पर तो घर में ऐसा सन्नाटा कभी नहीं रहा !... क्या मेरे बताए रंगों की परंपरा को तुम भूल गये ? बेटा उठ और घर को जीवंतता के प्रतीक रंगों से भरकर रंगों की परंपरा को आगे बढ़ा। तुम्हें यूं उदास देखकर मेरा अंतरमन रो रहा है, अब तुम्हारे चेहरे पर होली के रंगों को देखकर ही मुझे शांति मिलेगी।
                                                सिद्धार्थ हड़बड़ा कर उठ बैठा और थोड़ी देर कुछ सोचकर पत्नी सुधा एवं बच्चों को आवाज देकर बुलाया और कहा - ' आओ हम सभी मिलकर सकारात्मकता, जीवंतता और सृजन की प्रेरणा देते इन रंगों को घर-आंगन और एक-दूसरे पर लगाकर रंगों की परंपरा को आगे बढ़ाएं...,...कहते-कहते सिद्धार्थ के अंतस में रंगों के अजस्त्र निर्झर फूट पड़े। उसने मां की तस्वीर को निहारा, उसे लगा जैसे मां मुस्कुराकर आशीर्वाद दे रही हो।

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