Halloween party ideas 2015


जीवन क्या है ?
                  कोई इसे मिट्टी कहता है, तो कोई सोना ! किसी के लिए जीवन उत्सव है तो किसी के लिए अवसर, किसी के लिए समझौता है तो किसी के लिए दुःख का सागर...। सबके लिए जीवन का अपने-अपने अलग-अलग सोच व मायने है।
                 दार्शनिक भाव से विमर्श करें तो जीवन सरल सहज होते हुए भी किसी रहस्मयी कहानी की अनसुलझी पहेली है। कितनी अजीब बात है जीवन हमारा होते हुए भी इस पर हमारी मर्जी नहीं चलती, हम तो बस इसी मर्जी पर कठपुतली बन नाचते रहते हैं कभी हंसते हुए कभी रोते हुए...।

लीजिए प्रस्तुत है इस रविवार स्तंभ "एक कविता का वादा है तुमसे" के अंतर्गत 'जिंदगी' पर मेरी एक कविता....
जिंदगी
अच्छे कल की चाह में, आज खोता रहा,
जो मिला उसे भूल, नहीं के लिए रोता रहा।
आरजू करता रहा उजाले की उम्र भर,
न हो सका ऐसा, बीज जो अंधेरे का बोता रहा।
जो चाहा उस राह से अक्सर भटकती रही जिंदगी,
चलती रही अपनी मर्जी से, अनचाहा होता रहा।
क्या कहें इसे बंधन, परंपरा, नजरिया या डर,
जिसका कारण न जाना उन धारणाओं को ढोता रहा।
विवशता थी या अवसरों की नजरअंदाजी,
जाने क्यों अक्सर खुली आंखों से सोता रहा।
                                                     -- उमेश कुमार


लघुकथा - "रंगों की परंपरा"  -- उमेश कुमार
                                              रंगों के पावन पर्व होली की इंद्रधनुषी रंगों से समूचा नीलगगन सराबोर था। नगाड़ों की धमक के साथ जीवन और प्रकृति ताल मिला रहे थे। फगुनाहट बयार संग पकवानों की मीठी सुवास घर-घर तैर रही थी। लेकिन सिद्धार्थ का घर रंगविहीन, नीरवता में डूबा किसी दुःखद घटना का परिचय दे रहा था। आठ महीने पहले सिद्धार्थ के माताजी का स्वर्गवास हो गया था, इसलिए शोकसंतप्त परिवार ने इस साल होली नहीं मनाने का फैसला लिया था।
                                               घर के दोनों बच्चे अपनी समझदारी दिखाते हुए रंग-गुलाल और पिचकारी की जिद छोड़कर गुमसुम बैठे थे। अंदर कमरे में लेटा सिद्धार्थ यादों के ताने-बाने बुन रहा था। उसे मां के साथ बिताए स्वर्णिम पल याद आ रहे थे, उसकी आंखों में आंसुओं का समंदर लहरा रहा था। बचपन से अभी तक मां के साथ मनाई हर होली उसके जीवन के प्रेरक सच्चे रंग थे।
                                               पंद्रह दिन पहले से घर की साफ-सफाई और सजावट में मां जुट जाती थी। हर बार होली से जुड़ी कथा-कहानियां सुनाती। ....सोचते-सोचते सिद्धार्थ की आंखें लग गई। नींद में उसे लगा, मां वहां आकर कह रही हो - '...बेटा आज होली है और तुम उदास...बिना रंगों के ! ...होली पर तो घर में ऐसा सन्नाटा कभी नहीं रहा !... क्या मेरे बताए रंगों की परंपरा को तुम भूल गये ? बेटा उठ और घर को जीवंतता के प्रतीक रंगों से भरकर रंगों की परंपरा को आगे बढ़ा। तुम्हें यूं उदास देखकर मेरा अंतरमन रो रहा है, अब तुम्हारे चेहरे पर होली के रंगों को देखकर ही मुझे शांति मिलेगी।
                                                सिद्धार्थ हड़बड़ा कर उठ बैठा और थोड़ी देर कुछ सोचकर पत्नी सुधा एवं बच्चों को आवाज देकर बुलाया और कहा - ' आओ हम सभी मिलकर सकारात्मकता, जीवंतता और सृजन की प्रेरणा देते इन रंगों को घर-आंगन और एक-दूसरे पर लगाकर रंगों की परंपरा को आगे बढ़ाएं...,...कहते-कहते सिद्धार्थ के अंतस में रंगों के अजस्त्र निर्झर फूट पड़े। उसने मां की तस्वीर को निहारा, उसे लगा जैसे मां मुस्कुराकर आशीर्वाद दे रही हो।

होली के हास्य फुहार
होली के हिन्दी जोक्स चुटकुले
Holi Jokes in Hindi
Funny Holi Hindi Jokes 

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पति होली खेलकर आया और सीधे बाथरूम में घुसा।
थोड़ी देर बाद बाथरूम में जोरदार धमाका हुआ।
पत्नी - क्या हुआ...?
पति - कुछ नहीं, बनियान गिर गई !
पत्नी (आश्चर्य से) - क्या..., बनियान गिरने की आवाज इतनी भयानक...!!!
पति - ...बनियान के अंदर मैं भी था भागवान...!!!

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होली के मौके पर बड़े दिनों बाद दो दोस्तों की मुलाकात हुई।
पहला दोस्त - क्या तुम्हारी शादी हो गई ?
दूसरा दोस्त - हां हो गई, और तुम्हारी ?
पहला दोस्त - ' जाको राखे साईयां, मार सके न कोय।'

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होली के मौके पर रेवड़ीलाल ने अपने दोस्तों को डिनर पर बुलाया।
दोस्तों के आने से पहले वह कमरे में रखे सजावटी सामानों को हटाने लगा।
सामानों को हटाते देख उसका बेटा चंपू पूछने लगा - ' पापा क्या आपके दोस्त ये सामान ले जायेंगे ?'
रेवड़ीलाल - ' ले तो नहीं जायेंगे बेटा, लेकिन पहचान जरूर लेंगे।'

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होली के दो दिन पहले
रद्दीवाला - मैडम जी, पुराना रद्दी माल है क्या ?
औरत - वह अभी बाहर गए हैं, घर लौट आए तब आना !!!

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एक बदसूरत औरत यूट्यूब पर होली के क्लिप्स देख रही थी, अचानक पास बैठे पति से पूछने लगी, अगर कोई आदमी मुझे जबरदस्ती भगाकर ले जाने लगे तो तुम क्या करोगे ?
'मैं उस आदमी से कहूंगा, नेक इंसान भागने की जरुरत नहीं, आराम से जाओ।' पति ने ठंडी आहें भरते हुए कहा।

स्तंभ : एक कविता का वादा है तुमसे
Holi ke Geet in Hindi
Holi Kavita in Hindi


होली गीत : होली की हिलोर
उल्लास लिए आई होली,
उठ रही उमंगित नव हिलोर।
तन-मन रस-रंग में भीग रहा,
यादें कर रही हैं भाव-विभोर।
जीवन की हर शाखाओं पर,
स्नेह-प्रेम के सुमन खिले।
मस्ती से सनी व्याकुलता है,
आनंदित मन खुशियों में मिले।
हैं भाव उपजते और मिटते,
जीवन-पथ में क्षण-नित्यप्रति।
सीमाएं भी सिमित इनकी,
सिमटी-सिकुड़ी सी रहे गति।
पर होली में लेता हिलोर,
स्नेह-प्रेम-मस्ती सागर।
जिसकी हर लहर के छूने से,
सब भाव मिटे ठोकर खाकर।
होली की उमंगे और बढ़े,
विकसित हो प्रेम की नवशक्ति।
उद्देश्य मिले इस जीवन का,
पाकर हिलोर की नव भक्ति।
                           --उमेश कुमार

होली पर विशेष
HOLI Articles in Hindi

ऐसे बचें रंगों की परेशानियों से -


                                         इन्द्रधनुषी रंगों से सराबोर रंग-बिरंगा रंगीला पर्व है होली। रंगों से खेलना भला किसे नहीं भाता। लेकिन होली के यही आकर्षक रंग जब शरीर पर लगकर अनेक प्रकार की परेशानियां खड़ी करता है तो खुशी के ये रंग फीके पड़ जाते हैं। 
                                        अत: जरूरी है होली खेलने से पहले कुछ समय निकालकर स्वयं को इसके लिए तैयार कर लें ताकि संभावित परेशानियों से बचा जा सके।
होली खेलने से पहले और होली खेलने के बाद,  रखें इन बातों का ख्याल -
-- होली खेलने से पहले शरीर के खुले भागों पर वैसलीन, तेल या कोल्ड क्रीम लगाएं। सरसों या नारियल का तेल लगाने से त्वचा पर रंगों की पकड़ ढ़ीली रहती है।
-- बालों पर तेल लगा लें। महिलाएं बालों में तेल लगाकर जूड़ा बांध लें, ताकि रंग बालों के अंदर न पहुंच सके। तेल लगाने से रंग छुड़ाने में आसानी रहती है।
-- आंखों व मुंह में होली के रंगों को जाने से बचाएं क्योंकि रसायनों से बने रंग नाजुक अंगों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
-- यथासंभव ढीले-ढाले, सूती व पूरे बांह तक कपड़े पहने, ताकि रंग त्वचा के संपर्क में सीधे न आ सके।
-- रंग लगवाते समय चेहरे को नीचे झुकाकर रखें एवं आंखें बंद कर लें।
-- होली खेलने के तुरंत बाद पानी और उबटन से रंगों को छुड़ाएं। उबटन का प्रयोग सुरक्षित रहता है।
-- रंग छुड़ाने के गर्म पानी का इस्तेमाल बिल्कुल न करें, गर्म पानी से रंग और पक्के हो सकते हैं।
-- ग्रीस, ऑइल पेंट, पेंट, कीचड़ आदि से दूर रहें, ये सभी स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं।
-- होली खेलने के बाद आंखें अच्छी तरह धोएं। हो सके तो गुलाब जल या आई ड्राप इस्तेमाल करें।
-- नहाने के बाद पूरे शरीर पर माइश्चराइजर जरुर लगाएं।
-- रंग निकालने के लिए त्वचा को किसी भी कठोर चीज से न रगड़ें।
-- महिलाएं हाथों व पैरों के नाखूनों पर नेल पॉलिश लगा लें ताकि उन पर रंग न चढ़े।
-- सिर पर सूखा रंग लगा हो तो धोने से पहले कंघी कर लें और बालों को सूखे टॉवेल से पोछ लें।


स्तंभ - 'एक कविता का वादा है तुमसे' के अंतर्गत इस रविवार की मेरी कविता है, " ख़ुशी"

" तुम्हारे आँगन में
रोज आती हूँ मैं
...कभी प्रातः की स्वर्णिम धूप बनकर
...कभी बारिश की मुस्कुराती बूंदे बनकर
...कभी अदृश्य बयार में समाई
मधुर सुवास बनकर
...कभी रमणीय निशा में
चाँद की चांदनी बनकर
...और भी
न जाने कितने रूपों में
रहती हूँ तुम्हारे आस-पास
हमेशा...
...कितने करीब हूँ मैं तुम्हारे
...लेकिन....!
तुम्हारी नजरें
जाने क्या-क्या ढूंढती रहती है
दिन-रात
मुझे नजर अंदाज करके
...शायद...
तुम नहीं जानते
...मैं कौन हूँ...?
" मैं खुशी हूँ "
तुम्हारे अंतरमन की खुशी...."
                   -- उमेश कुमार 


International Women's Day 8 March
हमारे शास्त्रों में नारी को बहुत उच्च स्थान दिया गया है। मनु ने कहा है - जहां स्त्रियों की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। नारी को शास्त्रों में तो ऊंचा स्थान मिला है परंतु व्यावहारिक जगत में पुरुषों की ही सत्ता समाज में कायम रही और नारी को हेय की दृष्टि से ही देखा गया। हिन्दी के मूर्धन्य रचनाकार मैथिलीशरण गुप्त की निम्न पंक्तियां नारी व्यथा की यथार्थ अभिव्यक्ति है।
" अबला जीवन तेरी तो बस यही कहानी
आंचल में है दूध और नयनों में पानी।"
देश के कुछ सभ्य समाज और जागरुक संगठन जहां महिला हित में निरंतर प्रयासरत है, वहीं नारी उत्पीड़न और अत्याचार के वीभत्स समाचार आए दिन दिलोदिमाग को झकझोरे हुए हैं। जहां तक सामाजिक एवं पारिवारिक जीवन का प्रश्न है, महिलाओं की स्थिति अत्यंत कष्टप्रद है। हमारे देश में हर मिनट दहेज को लेकर एक मौत होती है, यौन उत्पीड़न का एक मामला दर्ज होता है और महिलाओं के खिलाफ कई आपराधिक वारदात होती है। आंकड़ों के अनुसार प्रतिवर्ष महिलाओं से संबंधित दर्ज 1.5 लाख अपराधों में से 50 हजार मामले घरेलू हिंसा के होते हैं। आज हमारे देश की बहुसंख्यक स्त्रियां पितृसत्तात्मक पाबंदियों के बीच एक सिमटी हुई दुनिया में जीवन गुजारने को मजबूर हैं।
हमारे समाज में महिलाओं पर दहेज, प्रताड़ना, हत्या, छेड़छाड़ और बलात्कार की आए दिन होने वाली घटनाएं एक ऐसी बीमारी का लक्षण है जो समाज में महिलाओं को उनका सही दर्जा न मिलने के कारण उत्पन्न हुई है। अमीर हो या गरीब, शहरी हो या ग्रामीण सभी महिलाओं की चुनौतियां एक सी है। देश में महिलाओं पर बढ़ती हिंसा व अपराध के खिलाफ महिला सशक्तिकरण सिर्फ महिलाओं का जिम्मा नहीं, बल्कि पूरे समाज का होना चाहिए।
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस हमें याद दिलाता है कि आज जबकि नारी सशक्त होकर हर क्षेत्र में सबल बनने को प्रयासरत है, हम सभी को उसकी मदद के लिए सदैव तत्पर रहना है। संविधान एवं सरकारी कानून सभी इसके लिए प्रतिबद्ध है। स्त्रियों का संघर्ष स्वहित के साथ सारे समाज की बेहतरी के लिए है, संसार को समरसता व रचनात्मकता की ओर मोड़ने के लिए है। पुरुषों को चाहिए कि वह नारी की निजता व स्वतंत्र अस्तित्व का सम्मान करना सीखे, तभी एक बेहतर समाज की कल्पना साकार होगी।

'रविवार' और 'कविता' यानि सरसता से परिपूर्ण उमंगित दिन। जी हां, अब ' सफलता सूत्र' पर कविता हर रविवार, स्तंभ - 'एक कविता का वादा है तुमसे' के अंतर्गत।
प्रस्तुत है इस स्तंभ की पहली कविता 'अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च)' के सुअवसर पर नारी को समर्पित...
                                                               
सूखी नदी

''जब मैं सागर थी
तब
समाहित होती थी
सैकडों जलधाराएँ
मुझमें आकर,
क्रीड़ाएं करते थे
असंख्य लहरें
मेरी आँचल के
हर छोर पर,
मेरा ही अंश लेकर
इठलाते थे मेघ
ऊँचे आकाश पर,
श्रृंगार करते थे
सूरज-चाँद-सितारे
मुझमें अपना
प्रतिबिम्ब निहारकर,
मेरे विस्तार की
सराहना होती थी
सर्वत्र,
पर अब
मै सागर नहीं रही
अब मैं
सूखी नदी हो गयी हूँ
जहां पर
दृष्टि नहीं जाती है
किसी की...''

     -- उमेश कुमार