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वसंत पर्व : आइए, जीवन में बसंत भरें
                                        'बसंत', न सिर्फ एक ऋतु अपितु प्रकृति और जीवन की सरसता का उमंग-उल्लास भरा महान उत्सव। बसंत आगमन के साथ प्रकृति पेड़-पौधों को नव कोपलों से भर देती है, आम्र के वृक्षों को आम्र मंजरियों से सजा देती है। सहस्त्र पुष्पों के विविध रंगों-गंधों से सुसज्जित प्रकृति की निराली छटा देखते ही बनती है। सर्वत्र सुर्ख गुलमोहर एवं पलाश के चटख सिंदूरी रंग प्रकृति में उमंग-मस्ती के नए चित्र उकेरती है।सरसों और अलसी के पीले-नीले कोमल पुष्पों से प्रकृति के आंचल में सौंदर्य के निर्झर बह उठते हैं। साथ ही बसंत हमारे तन-मन में घोल देता है नव उमंग-उत्साह, स्फूर्ति और सौंदर्य का जीवन रस।
                                         वास्तव में बसंत एक रचना है। हमारे अंदर की रचनात्मक वृत्ति को जगाकर सकारात्मक नवीनता की ओर पग बढ़ाने का अवसर है बसंत। वर्तमान भौतिकवादी व आधुनिक जीवनशैली के चलते बसंत जाने कहीं विस्मृत सा हो गया है। संपन्नता के तमाम सुख-साधन होने के बावजूद कहीं न कहीं नीरसता, एकाकीपन रूपी पतझड़ मन में व्याप्त है। वैसे बाजारवाद के दौर में कृत्रिमता की अंधी आंधी से दुनिया पहले से कहीं अधिक रंग-बिरंगी और चमकदार हो गई है, इसे देखकर बसंत होने का भ्रम हो जाता है। लेकिन सोचने वाली बात यह है, क्या यह कृत्रिम बसंत हमारे अंतरमन को स्पर्श करता है? क्या इस बसंत से हमारे मन में आनंद के स्रोत फूट पड़ते हैं ? शायद नहीं ! क्योंकि इस बनावटीपन से वह महान अनुभूति कभी नहीं मिल सकती जो जीवंत बसंत के मूल में है।
                                           आज वैश्वीकरण के चलते बाजारवाद इस कदर हावी है कि प्रकृति के सरल-सहज स्वरूप के समांतर सर्वत्र एक कृत्रिम दुनिया गढ़ी जा रही है। महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक प्लास्टिक के फूलों और बनावटी रंगों से बसंत की आभासी दुनिया तैयार की जा रही है। ऐसी दुनिया में प्रेम, स्नेह, सद्भाव, भाईचारा आदि मानवीय संवेदनाएं धीरे-धीरे लुप्त हो रही है। यह अत्यंत चिंता का विषय है।
                                           मन में प्रश्न उठता है आखिर बसंत हमें स्पर्श क्यों नहीं करता? इसका उत्तर है हम बसंत को स्पर्श नहीं करते। आज भी बसंत वही है, फूल-पौधे, सब्ज पेड़, चहचहाती पक्षियां, मधुर बयार, नीलगगन, चांद-सितारे, मनोरम प्रभात, सुरमयी सांझ प्रकृति की हर कृति वही है। बदल गए हैं तो सिर्फ हम। हम अपने मन में छुपे बसंत रूपी अनुभूतियों को सरसता रूपी निर्झर से सींचना भूल गये हैं। डर है कहीं यह शुष्कता भावी पीढ़ी को पतझड़ सा नीरस न बना दे।
                                             प्रयास हमें करना है इस जीवनधारा को बचाए रखने का। बसंत संवेदनहीन जीवन के लिए आनंद रूपी सरिता है। मन को सरसता से भरता अमिट सुवास है। यह संपूर्ण जीवन दर्शन है। हमें तन-मन लगाकर अक्षुण्ण रखना होगा इस महान परंपरा व संस्कृति को।

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