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एंड्राइड : रोचक तथ्य
                               विश्व में करोड़ों लोगों का पसंदीदा मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम है, एंड्राइड। एंड्राइड के नए-नए वर्जन आते रहते हैं। इसके फीचर्स हर बार नया आकर्षण लिए हुए होते हैं, साथ ही स्वीट्स के नाम पर एंड्राइड का नामकरण काफी दिलचस्प होता है।
आइए जानें एंड्राइड से जुड़े कुछ रोचक तथ्य...
-- विश्व में सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम 'एंड्राइड' है।
-- एंड्राइड शब्द का हिन्दी अर्थ, मानव के जैसे दिखने एवं कार्य करने वाला रोबोट होता है।
-- एंडी रुबिन ने एंड्राइड इंक कंपनी की स्थापना की थी।
-- वर्ष 2003 में प्रारंभ हुई एंड्राइड इंक कंपनी शुरुआत में आर्थिक समस्या के चलते बंद होने के कगार पर आ चुकी थी। वर्ष 2005 में गूगल द्वारा इसे खरीद लिए जाने के बाद यह विश्व का सर्वाधिक लोकप्रिय मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम बन गया।
-- एंड्राइड ऑपरेटिंग सिस्टम के प्रत्येक वर्जन का नाम स्वीट्स के नाम पर ही रखे जाते हैं। जैसे - ' लोलीपोप', 'किटकैट' आदि।
-- एंड्राइड ऑपरेटिंग सिस्टम के नाम से संबंधित एक दिलचस्प बात यह भी है कि इसके हर वर्जन का नाम अंग्रेजी के अल्फाबेट्स के अनुसार रखा जाता है।
जैसे - प्रथम वर्जन का नाम A से 'Alpha' था। दूसरे का नाम B से 'Beta' था। इस क्रम में अभी इसके लेटेस्ट वर्जन का नाम M से 'Marshmallow' है।
एंड्राइड वर्जन सूची
Android Version Names
Alpha (1.0)
Beta (1.1)
Cupcake (1.5)
Donut (1.6)
Eclair (2.0 - 2.1)
Froyo (2.2 - 2.2.3)
Gingerbread (2.3 - 2.3.7)
Honeycomb (3.0 - 3.2.6)
Ice Cream Sandwich (4.0 - 4.0.4)
Jelly Bean (4.1- 4.3.1)
KitKat (4.4 - 4.4.4)
Lollipop (5.0 - 5.1.1)
Marshmallow (6.0 - 6.0.1)


                                        क्या आपको पता है, हमसफ़र बनकर हमेशा आपके साथ रहने वाला मोबाइल फोन आपके और आपके परिवारजनों के लिए खतरे की घंटी बजा सकती है ?
                                       जी हां, मोबाइल फोन से निकलने वाले रेडिएशन की अधिकता आपके दिमाग पर दुष्प्रभाव डाल सकती है, साथ ही अनेक घातक बीमारियों को आमंत्रित कर सकती है। हमेशा मोबाइल फोन से चिपके रहने वालों के लिए तो यह और भी चिंताजनक विषय है।
ऐसे जानें अपने मोबाइल फोन का रेडिएशन लेवल -
-- मोबाइल फोन पर डायल करें
*#07#
-- डायल करते ही स्क्रीन पर मोबाइल का रेडिएशन लेवल प्रदर्शित हो जाएगा।
अब जरा गौर करें -
अंतर्राष्ट्रीय एवं भारतीय मानक के अनुसार मोबाइल फोन का रेडिएशन लेवल 1.6 वाट/किलोग्राम से अधिक नहीं होना चाहिए।
- यदि यह लेवल 1.6 Watt/Kg से कम है तो आपका मोबाइल सुरक्षित रेडिएशन लेवल में है।
- यदि यह लेवल 1.6Watt/Kg से अधिक है तो यह आपके स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
क्या है समाधान -
-- यदि आपके पास जो मोबाइल फोन है उसका रेडिएशन लेवल सुरक्षित लेवल से अधिक है तो आपको मोबाइल बदल देना चाहिए।
-- जब भी मोबाइल फोन खरीदें, इसका SAR यानि Specific Absorption Rate चेक करें (फोन के यूजर मेनुअल में यह संख्या छपी होती है)। ऐसा फोन खरीदें जिसका SAR कम हो, क्योंकि इसमें रेडिएशन का खतरा कम होता है।

प्रेमराग : प्रेम पर मेरी दस कविता

1. प्रेम पंखुरी
" किसी फूल की
पंखुरी पर टिमटिमाते
ओस कण जैसा
होता है प्रेम...
जाने किस तपन से
उड़ जाए ये
वाष्प बन...
या
हल्की ठोकर पा
मिल जाए
मिट्टी में..."
2. प्रेम पहेली
'प्रेम'
एक पहेली...
जिसने सुलझाया
व्यक्त न कर पाया...
जो उलझा
मौके ढूंढ़ते रहता है
व्यक्त करने के...
3. अँधा प्रेम
अँधा प्रेम
लोग कहते हैं...
'प्रेम अँधा होता है'
...लेकिन
प्रेम अंधा नहीं होता
क्योंकि
जहां प्रेम अंधा होता है
वहां
प्रेम नहीं होता...
4. नजरिया
'प्रेम'
...अपने आप में
किसी और को
देख पाना...।
5. प्रेम की कीमत
बेच देना
अपना संपूर्ण जीवन
नि:शुल्क।

6. प्रेम पीत
प्रेम...
बसंत की
नर्म पीली धूप
और
ढ़ेर सी
पीली तितलियों का
रंग लेकर
अदृश्य बयार में
पीलापन भरना...।
7. प्रेम की भाषा
" सुबह की लालिमा
सीखती है
हर रोज
ढ़ेर सारी भाषाएं
राजनीति की
प्रेम की
ज्ञान की
विज्ञान की...
दोपहरी तक
हो जाती है वो
पारंगत
हर भाषा में...
लेकिन
शाम तक
वो भूल जाती है
हर भाषा...
उसे तो याद रहता है
सिर्फ
प्रेम की भाषा
और उसकी
लालिमा...।"
8. मिट्टी
प्रेम...
मिट्टी का
मिट्टी को
पाने के लिए
जद्दोजहद...
आखिर
मिट्टी का
मिट्टी में मिल जाना...।
9. प्रेम सुवास
यादों के झरोखों से
कुछ चिर-परिचित
खुशबुओं का आना
और
महका जाना
हृदय के
उस कोने को
जहां
अतीत के फूल
हमेशा ताजा
रहते हैं...।
10. प्रेमानुभूति
प्रेम...
मंदाकिनी से उतरती
रोशनी के निर्झर में
सवार...
हजारों आकाशगंगाओं की
दूरी तय कर
जीवन के बीज को
अंकुरित कर
सौंप देना
एक अनुभूति को
पीढ़ी दर पीढ़ी
अंतहीन समय के लिए...।

प्रेमराग 
तुम्हारी आंखों का बचपन
खेलता था जब अल्हड़ खेल,
स्निग्ध संकेतों में सुकुमार,
बिछल, चल थक जाता तब हार,
छिड़कता अपना गीलापन,
उसी रस में तिरता जीवन.
तुम्हारी आंखों का बचपन!
आज भी है क्या नित्य किशोर-
उसी क्रीड़ा में भाव-विभोर-
सरलता का वह अपनापन-
आज भी है क्या मेरा धन!
तुम्हारी आंखों का बचपन!
              -- जयशंकर प्रसाद

संस्रिति के विस्तृत सागर में
सपनों की नौका के अंदर
दुख-सुख की लहरों में
उठ गिर बहता जाता,
मैं सो जाता।
आंखों में भरकर प्यार अमर
आशीष हथेली में भरकर
कोई मेरा सिर गोदी में रख
सहलाता,
मैं सो जाता।
मेरे जीवन का खारा जल
मेरे जीवन का हलाहल
कोई अपने स्वर में मधुमय कर बरसता
मैं सो जाता
               -- हरिवंशराय बच्चन

कौन नहीं जानता
आंखें बोलती हैं
छुपाओ रहस्यों को जितना
आंखें उतना खोलती हैं।
बंद मत करो
आंखों का यह महाकाव्य
ध्यान के आवरण में
उड़ने दो
इसके पन्ने
अचानक भाग्य की तरह आई
आंधी के वातावरण में।
                 -- भवानीप्रसाद मिश्र

घिर गया नभ,
उमड़ आए मेघ काले
भूमि के कंपित उरोजों पर झुका-सा
विशद श्वासाहत,
चितातुर
छ गया इंद्र का नील वक्ष
व्रज सा, यदि तड़ित से
झुलसा हुआ सा।
आह, मेरा श्वास है उत्तप्त
धमनियों में उमड़ आई
लहू की धार
प्यार है अभिशप्त
तुम कहां हो नारि...???
                      --अज्ञेय

रात आधी बीती होगी
थकी-हारी
नींद को मनाती आंखें
अचानक व्याकुल हो उठीं
कहीं से आवाज आई
'अरे, अभी खटिया पर पड़ी हो
'उठो! बहुत दूर जाना है
आकाशगंगा को तैरकर जाना है'
मैं हैरान होकर बोली -
'मैं तैरना नहीं जानती
पर ले चलो
तो आकाशगंगा में डूबना चाहूंगी'
एक ख़ामोशी - हल्की हंसी
' नहीं डूबना नहीं, तैरना है...
मैं हूं...ना...'
और फिर जहां तक कान पहुंचते थे
एक बांसुरी की आवाज आती रही...
                   -- अमृता प्रीतम


"... यह ऋतु कहता है, मन को प्रकृति की डोर से बांधो और उड़ा दो संभावनाओं के विस्तृत आकाश में..."


                                         धरती पर एक बार फिर वसंत उतर आया है। 'वसंत' जो खिलखिला रहा है पेड़ों, पत्तों, फूलों, रास्तों, हवाओं में...सर्वत्र...। उसकी मधुर मुस्कान एक अनकही भावाभिव्यक्ति लिए सुबह की नर्म पीली धूप से लेकर शाम के गुलाबी तक निर्दोष बिखरी पड़ी है। ऐसा लगता है मानों 'धरती वसंत की कविता' बन गई हो।
                                         मौसम और मन का बड़ा गहरा नाता है। वसंत जब आंखों से होकर मन में उतरता है तब मन में उमंग-उल्लास, प्रेम के सुप्त बीज अंकुरित हो उठते हैं। किसी ने कहा है, जब प्रकृति ने उम्मीद रचा, तब प्रेम रचा और वसंत भी रची।
                                         वसंत से ही मन में गति और प्रकृति में सृजन का गीत उपजता है। यह ऋतु कहता है, मन को प्रकृति की डोर से बांधो और उड़ा दो संभावनाओं के विस्तृत आकाश में। पतझड़ के सूनेपन के बाद वसंत अपने अनन्यतम रूप से जीवन में जीवनीशक्ति का संचार करता है। यह पुनर्नवा की भांति जीवन में आता है और एकरसता समाप्त कर उदास व वीरान पलों में स्वर्णिम सम्मोहन भर जाता है
                                         लेकिन वसंत कहां टिक पाता है? जीवन में प्रेम, उमंग-उत्साह भरकर उसे विदा होना पड़ता है। पतझड़-वसंत, आना-जाना, मिलना-बिछड़ना, सुख- दुःख जीवन का अनवरत क्रम है। इस क्रम के सम्मोहन में ही जीवन रूपी गाड़ी मजे से चलती है। जो भी हो प्रतीक्षा के मायावी पलों का जो आनंद है वह निश्चित रूप से आने वाले वसंत में दुगुना होकर ही मिलेगा।

वसंत पर सुमित्रानंदन पंत की हृदयस्पर्शी कविता
फिर वसंत की आत्मा आई,
मिटे प्रतीक्षा के दुर्वह क्षण,
अभिवादन करता भू का मन !
दीप्त दिशाओं के वातायन,
प्रीतिसांस-सा मलय समीरण,
चंचल नील, नवल भू यौवन,
फिर वसंत की आत्मा आई,
आम्र मौर में गूंथ स्वर्ण कण,
किंशुक को कर ज्वाल वसन तन !
देख चुका मन कितने पतझर,
ग्रीष्म शरद, हिम पावस सुंदर,
ऋतुओं की ऋतु यह कुसुमाकर,
फिर वसंत की आत्मा आई,
विरह मिलन के खुले प्रीति व्रण,
स्वप्नों से शोभा प्ररोह मन !
सब युग सब ऋतु थीं आयोजन,
तुम आओगी वे थीं साधन,
तुम्हें भूल कटते ही कब क्षण?
फिर वसंत की आत्मा आई,
देव, हुआ फिर नवल युगागम,
स्वर्ग धरा का सफल समागम !

                                         प्रेम के ढाई अक्षर में जीवन का संगीत छुपा है। प्रेम के सानिध्य में हर रिश्ता फूल सा महकता है। प्रेम एक ऐसा राह है जो आदि से अनादि तक पहुंचाती है। यह अखिल ब्रह्मांड का सबसे खुबसूरत अहसास है। सारी कायनात इसी में समाहित है।
                                         सबके पास प्रेम की अपनी-अपनी परिभाषाएं और सीमाएं हैं। प्रेम का न कोई ओर है न छोर। लीजिये प्रेम के रंग-बिरंगे विचार और अनुभूतियां आपके प्रेममय जीवन के लिए -
मोहब्बत एक खुश्बू है हमेशा साथ चलती है
कोई इंसान तन्हाई में भी तन्हां नहीं रहता।
                  -- निदा फ़ाजली
एक-दूसरे से प्रेम करें, लेकिन प्रेम का कोई बंधन न बांधें, बल्कि इसे अपनी आत्माओं के किनारों के बीच एक बहते हुए सागर के समान रहने दें।
                  -- खलील जिब्रान
प्रेम अनगिनत रूपों, अनगिनत समय, जीवन और उम्र के बाद होता रहता है।
                   -- रवीन्द्रनाथ टैगोर
मायूस होके पलटीं जब हर तरफ़ से नजरें
दिल ही को बुत बनाया दिल ही से गुफ़्तगू की
                    -- जिगर मुरादाबादी
 यदि आप लोगों का आकलन करते हैं तो आपके पास उन्हें प्यार करने का समय नहीं।
                     -- मदर टेरेसा
प्रेम एक दान है, भिक्षा नहीं, प्रेम मांग नहीं, भेंट है। प्रेम भिखारी नहीं, सम्राट है। जो मांगता है उसे बांटता है उसे प्रेम मिलता है।
                      -- ओशो
मुझे सहल हो गईं मंजिलें, वो हवा के रूख़ भी बदल गए
तेरा हाथ हाथ में आ गया कि चिराग़ राह में जल गए
                      -- मजरूह सुल्तानपुरी
 प्रेम कभी दावा नहीं करता, वह तो हमेशा देता है। प्रेम हमेशा कष्ट सहता है। न कभी झुंझलाता है, न बदला लेता है।
                       -- महात्मा गांधी
प्रेम बलिदान सिखाता है, हिसाब नहीं सिखाता। प्रेम मस्तिष्क को नहीं हृदय को छूता है।
                        -- अज्ञात
खाइएगा इक निगाहे-लुत्फ़ का कब तक फ़रेबकोई अफ़साना बना कर बदनुमा हो जाइए
                       -- मजाज़
छुपा के फूलों में मुंह सबा से जो मुस्कुराये सहर कली है
तबस्सुम उस गुल का याद करके हुई अजब दिल की बेकली है
                       -- जौक़
तुझको ख़बर नहीं मगर इक सादा-लौह कोबर्बाद कर दिया तेरे दो दिन के प्यार ने
                      -- साहिर लुधियानवी
उनके देखे से जो आ जाती है मुंह पर रौनक,
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।
                     -- ग़ालिब
हर आन में हर बात में हर ढंग में पहचान,
आशिक है तो दिलबर को हर-एक रंग में पहचान।
                       -- नजीर अकबराबादी

 उर्दू और हिन्दी के नामचीन शायर निदा फाजली का 8 फरवरी 2016 को दिल का दौरा पड़ने से मुंबई में निधन हो गया। अपने लेखन की अनूठी शैली से निदा फाजली काफी प्रसिद्ध हुए। अपनी शायरी के माध्यम से उन्होंने जीवन के विविध पहलुओं की हकीकत बयां की। वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक थे। उनकी रचनाओं में साम्प्रदायिक सौहार्दता प्रकट होती रही है। निदा फाजली साहित्य अकादमी, पद्म श्री सम्मान से सम्मानित थे।
' सफलता सूत्र' में 'निदा फाजली' के लिखे कुछ अत्यंत लोकप्रिय व खुबसूरत गीत व गजल आपके लिए...
1.
कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता
कहीं जमीं तो कहीं आस्मां नहीं मिलता
बुझा सका है भला कौन वक्त के शोले
ये ऐसी आग है जिसमें धुआँ नहीं मिलता
तमाम शहर में ऐसा नहीं खुलूस न हो
जहाँ उम्मीद हो इसकी वहाँ नहीं मिलता
कहाँ चराग़ जलाएँ कहाँ गुलाब रखें
छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता
ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं
जुबाँ मिली है मगर हमजुबाँ नहीं मिलता
चराग़ जलते ही बिनाई बुझने लगती है
खुद अपने घर में ही घर का निशाँ नहीं मिलता।

2.
होश वालों को ख़बर क्या बेख़ुदी क्या चीज़ है
इश्क़ कीजे फिर समझिए जिंदगी क्या चीज़ है
उन से नज़रें क्या मिली रोशन फिजाएँ हो गईं
आज जाना प्यार की जादूगरी क्या चीज़ है
ख़ुलती ज़ुल्फ़ों ने सिखाई मौसमों को शायरी
झुकती आँखों ने बताया मयकशी क्या चीज़ है
हम लबों से कह न पाये उनसे हाल-ए-दिल कभी
और वो समझे नहीं ये ख़ामोशी क्या चीज़ है।

3.
हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तनहाइयों का शिकार आदमी
सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ
अपनी ही लाश का खुद मज़ार आदमी
हर तरफ़ भागते-दौड़ते रास्ते
हर तरफ़ आदमी का शिकार आदमी
रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ
हर नये दिन, नया इन्तज़ार आदमी
ज़िन्दगी का मुकद्दर सफ़र-दर-सफ़र
आख़िरी साँस तक बेक़रार आदमी।

4.
तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल है
जहाँ भी जाऊं ये लगता है तेरी महफ़िल है
ये आसमान, ये बादल, ये रास्ते, ये हवा
हर एक चीज़ है अपनी जगह ठिकाने से
कई दिनों से शिकायत नहीं जमाने से
ये जिंदगी है सफ़र, तू सफ़र की मंज़िल है
हर एक फूल किसी याद सा महकता है
तेरे ख़याल से जागी हुई फिजायें है
ये सब्ज़ पेड़ है, या प्यार की दुआएं हैं
तू पास हो के नहीं फिर भी तू मुक़ाबिल है
हर एक शै है मोहब्बत के नूर से रोशन
ये रोशनी जो ना हो, जिंदगी अधूरी है
राह-ए-वफ़ा में, कोई हमसफ़र ज़रूरी है
ये रास्ता कही तनहा कटे तो मुश्किल है।

5.
दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
मिल जाये तो मिट्टी है खो जाये तो सोना है
अच्छा-सा कोई मौसम तन्हा-सा कोई आलम
हर वक़्त का रोना तो बेकार का रोना है
बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने
किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है
ग़म हो कि ख़ुशी दोनों कुछ देर के साथी हैं
फिर रस्ता ही रस्ता है हँसना है न रोना है
ये वक्त जो तेरा है, ये वक्त जो मेरा
हर गाम पर पहरा है, फिर भी इसे खोना है
आवारा मिज़ाजी ने फैला दिया आंगन को
आकाश की चादर है धरती का बिछौना है।

वसंत पर्व : आइए, जीवन में बसंत भरें
                                        'बसंत', न सिर्फ एक ऋतु अपितु प्रकृति और जीवन की सरसता का उमंग-उल्लास भरा महान उत्सव। बसंत आगमन के साथ प्रकृति पेड़-पौधों को नव कोपलों से भर देती है, आम्र के वृक्षों को आम्र मंजरियों से सजा देती है। सहस्त्र पुष्पों के विविध रंगों-गंधों से सुसज्जित प्रकृति की निराली छटा देखते ही बनती है। सर्वत्र सुर्ख गुलमोहर एवं पलाश के चटख सिंदूरी रंग प्रकृति में उमंग-मस्ती के नए चित्र उकेरती है।सरसों और अलसी के पीले-नीले कोमल पुष्पों से प्रकृति के आंचल में सौंदर्य के निर्झर बह उठते हैं। साथ ही बसंत हमारे तन-मन में घोल देता है नव उमंग-उत्साह, स्फूर्ति और सौंदर्य का जीवन रस।
                                         वास्तव में बसंत एक रचना है। हमारे अंदर की रचनात्मक वृत्ति को जगाकर सकारात्मक नवीनता की ओर पग बढ़ाने का अवसर है बसंत। वर्तमान भौतिकवादी व आधुनिक जीवनशैली के चलते बसंत जाने कहीं विस्मृत सा हो गया है। संपन्नता के तमाम सुख-साधन होने के बावजूद कहीं न कहीं नीरसता, एकाकीपन रूपी पतझड़ मन में व्याप्त है। वैसे बाजारवाद के दौर में कृत्रिमता की अंधी आंधी से दुनिया पहले से कहीं अधिक रंग-बिरंगी और चमकदार हो गई है, इसे देखकर बसंत होने का भ्रम हो जाता है। लेकिन सोचने वाली बात यह है, क्या यह कृत्रिम बसंत हमारे अंतरमन को स्पर्श करता है? क्या इस बसंत से हमारे मन में आनंद के स्रोत फूट पड़ते हैं ? शायद नहीं ! क्योंकि इस बनावटीपन से वह महान अनुभूति कभी नहीं मिल सकती जो जीवंत बसंत के मूल में है।
                                           आज वैश्वीकरण के चलते बाजारवाद इस कदर हावी है कि प्रकृति के सरल-सहज स्वरूप के समांतर सर्वत्र एक कृत्रिम दुनिया गढ़ी जा रही है। महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक प्लास्टिक के फूलों और बनावटी रंगों से बसंत की आभासी दुनिया तैयार की जा रही है। ऐसी दुनिया में प्रेम, स्नेह, सद्भाव, भाईचारा आदि मानवीय संवेदनाएं धीरे-धीरे लुप्त हो रही है। यह अत्यंत चिंता का विषय है।
                                           मन में प्रश्न उठता है आखिर बसंत हमें स्पर्श क्यों नहीं करता? इसका उत्तर है हम बसंत को स्पर्श नहीं करते। आज भी बसंत वही है, फूल-पौधे, सब्ज पेड़, चहचहाती पक्षियां, मधुर बयार, नीलगगन, चांद-सितारे, मनोरम प्रभात, सुरमयी सांझ प्रकृति की हर कृति वही है। बदल गए हैं तो सिर्फ हम। हम अपने मन में छुपे बसंत रूपी अनुभूतियों को सरसता रूपी निर्झर से सींचना भूल गये हैं। डर है कहीं यह शुष्कता भावी पीढ़ी को पतझड़ सा नीरस न बना दे।
                                             प्रयास हमें करना है इस जीवनधारा को बचाए रखने का। बसंत संवेदनहीन जीवन के लिए आनंद रूपी सरिता है। मन को सरसता से भरता अमिट सुवास है। यह संपूर्ण जीवन दर्शन है। हमें तन-मन लगाकर अक्षुण्ण रखना होगा इस महान परंपरा व संस्कृति को।