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 'स्वर्ग' इस शब्द का विचार मन में आते ही खूबसूरती से आच्छादित, अलौकिक, दुःखों से रहित, तमाम सुख-सुविधाओं व आनंद से परिपूर्ण संसार की कल्पना मन को गुदगुदा जाती है। कल्पना में एक ऐसा स्थान मानस पटल पर उभरता है, जहां हमारी समस्त अभिलाषाएं पूरी हो जाती है, जहां दुःख, शोक, डर, क्लेश, दुर्भावों का कोई नामोनिशान तक नहीं है, जहां सर्वत्र सुख, शांति, समृद्धि का वातावरण व्याप्त है।
क्या सचमुच 'स्वर्ग' ऐसा होगा या यह एक कल्पना या मान्यता मात्र भर है ? दरअसल इसकी वास्तविकता पर प्रमाणिक रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता। क्योंकि आज तक कोई स्वर्ग कभी गया नहीं और कभी कोई वहां गया भी होगा तो वह स्वर्ग के बारे में बताने वापस नहीं लौटा।

आखिर स्वर्ग कहां है, कैसा है ? विश्व भर में स्वर्ग के बारे में अनेक मान्यताएं व विचार हैं। आइए कुछ महापुरुषों का स्वर्ग के बारे में विचारों से जानने का प्रयास करें कि स्वर्ग कहां है, कैसा है।
-- जहां हमारी सुंदर कल्पना, आदर्श का नीड़ बनाकर रहती है, वहीं स्वर्ग है। वही विहार का, वही प्रेम का स्थल स्वर्ग है और वह इसी लोक में मिलता है।
                               - जयशंकर प्रसाद
-- यदि स्वर्ग कोई स्थान है तो प्रेम ही वहां जाने का मार्ग है।
                               - टालस्टाय
-- स्वर्ग मनुष्य के जीवन में है। वह ठोस नहीं तरल है, जो मंदाकिनी की तरह मानव के प्राणों में कल-कल ध्वनि करता है। वह प्रेम में है, दया में है, सहानुभूति में है।
                               - डॉ. रामकुमार वर्मा
-- ईश्वर से तादात्म्य ( एकत्व) स्थापित करना ही स्वर्ग है।
                                - महात्मा कन्फ्यूशियस
-- जो परोपकार में रत है, ईश्वर में जिसको विश्वास है और जो सत्य का अनुसरण करता है, उसके लिए भूमंडल ही स्वर्ग है।
                                - बेकन
-- मन अपने भीतर ही स्वर्ग को नर्क और नर्क को स्वर्ग बना सकता है।
                                - मिल्टन
-- तेरा स्वर्ग तेरी मां के पैरों तले है।
                                 - हजरत मोहम्मद साहब
-- स्वर्ग और पृथ्वी सब हमारे अंदर ही हैं। हम पृथ्वी से तो परिचित हैं पर अपने अंदर के स्वर्ग से बिल्कुल अपरिचित हैं।
                                 -महात्मा गांधी
अंतत: इन अनमोल विचारों से यह निष्कर्ष सामने आता है कि स्वर्ग एवं नरक हमारे जीवन की स्थितियों के ही नाम है। जब हम दुःख, शोक, व्याधियों में डूबे होते हैं तब हमारे सामने नर्क का दृश्य उपस्थित रहता है और जब हम इन सबसे परे सुख व आनंद की स्थिति में होते हैं तब स्वर्ग का अनुभव करते हैं।
सुख और दुःख का मिलना हमारे ही कर्मों का प्रतिफल है। सत्यता यह है कि स्वर्ग या नरक हमारे ही कर्मों से बनता है।

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