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MAHATMA GANDHI QUOTES IN HINDI -
 
हम जैसा सोचते हैं हमारे जीवन का निर्माण भी उसी दिशा में होता है। आइये महात्मा गांधी के महान अनमोल विचारों को अपनाकर अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लाएं -
-- विश्व के सभी धर्म, भले ही और चीजों में अंतर रखते हों, लेकिन सभी इस बात पर एकमत हैं कि दुनिया में कुछ नहीं बस सत्य जीवित रहता है।
-- आप मानवता में विश्वास मत खोइए। मानवता सागर की तरह है, अगर सागर की कुछ बूंदे गंदी हैं, तो सागर गंदा नहीं हो जाता।
-- मेरा धर्म सत्य और अहिंसा पर आधारित है। सत्य मेरा भगवान है और अहिंसा उसे पाने का साधन।
-- ऐसे जियो जैसे कि तुम कल मरने वाले हो, ऐसे सीखो कि हमेशा के लिए जीने वाले हो।
-- जब मैं निराश होता हूं, मैं याद कर लेता हूं कि समस्त इतिहास के दौरान सत्य और प्रेम के मार्ग की ही हमेशा विजय होती है।
-- अपनी भूलों को स्वीकार करना उस झाड़ू के समान है जो गंदगी को साफ कर उस स्थान को पहले से अधिक स्वच्छ कर देती है।
-- जहां प्रेम है वहां जीवन है।
-- कमजोर किसी को माफ नहीं कर सकते, माफ करना मजबूत लोगों की निशानी है।
-- व्यक्ति अपने विचारों से निर्मित एक प्राणी है, वह जो सोचता है वही बन जाता है।
-- अपने दोष हम देखना नहीं चाहते, दूसरों के देखने में हमें मजा आता है। बहुत सारे दोष तो इसी आदत से पैदा होते हैं।


 'स्वर्ग' इस शब्द का विचार मन में आते ही खूबसूरती से आच्छादित, अलौकिक, दुःखों से रहित, तमाम सुख-सुविधाओं व आनंद से परिपूर्ण संसार की कल्पना मन को गुदगुदा जाती है। कल्पना में एक ऐसा स्थान मानस पटल पर उभरता है, जहां हमारी समस्त अभिलाषाएं पूरी हो जाती है, जहां दुःख, शोक, डर, क्लेश, दुर्भावों का कोई नामोनिशान तक नहीं है, जहां सर्वत्र सुख, शांति, समृद्धि का वातावरण व्याप्त है।
क्या सचमुच 'स्वर्ग' ऐसा होगा या यह एक कल्पना या मान्यता मात्र भर है ? दरअसल इसकी वास्तविकता पर प्रमाणिक रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता। क्योंकि आज तक कोई स्वर्ग कभी गया नहीं और कभी कोई वहां गया भी होगा तो वह स्वर्ग के बारे में बताने वापस नहीं लौटा।

आखिर स्वर्ग कहां है, कैसा है ? विश्व भर में स्वर्ग के बारे में अनेक मान्यताएं व विचार हैं। आइए कुछ महापुरुषों का स्वर्ग के बारे में विचारों से जानने का प्रयास करें कि स्वर्ग कहां है, कैसा है।
-- जहां हमारी सुंदर कल्पना, आदर्श का नीड़ बनाकर रहती है, वहीं स्वर्ग है। वही विहार का, वही प्रेम का स्थल स्वर्ग है और वह इसी लोक में मिलता है।
                               - जयशंकर प्रसाद
-- यदि स्वर्ग कोई स्थान है तो प्रेम ही वहां जाने का मार्ग है।
                               - टालस्टाय
-- स्वर्ग मनुष्य के जीवन में है। वह ठोस नहीं तरल है, जो मंदाकिनी की तरह मानव के प्राणों में कल-कल ध्वनि करता है। वह प्रेम में है, दया में है, सहानुभूति में है।
                               - डॉ. रामकुमार वर्मा
-- ईश्वर से तादात्म्य ( एकत्व) स्थापित करना ही स्वर्ग है।
                                - महात्मा कन्फ्यूशियस
-- जो परोपकार में रत है, ईश्वर में जिसको विश्वास है और जो सत्य का अनुसरण करता है, उसके लिए भूमंडल ही स्वर्ग है।
                                - बेकन
-- मन अपने भीतर ही स्वर्ग को नर्क और नर्क को स्वर्ग बना सकता है।
                                - मिल्टन
-- तेरा स्वर्ग तेरी मां के पैरों तले है।
                                 - हजरत मोहम्मद साहब
-- स्वर्ग और पृथ्वी सब हमारे अंदर ही हैं। हम पृथ्वी से तो परिचित हैं पर अपने अंदर के स्वर्ग से बिल्कुल अपरिचित हैं।
                                 -महात्मा गांधी
अंतत: इन अनमोल विचारों से यह निष्कर्ष सामने आता है कि स्वर्ग एवं नरक हमारे जीवन की स्थितियों के ही नाम है। जब हम दुःख, शोक, व्याधियों में डूबे होते हैं तब हमारे सामने नर्क का दृश्य उपस्थित रहता है और जब हम इन सबसे परे सुख व आनंद की स्थिति में होते हैं तब स्वर्ग का अनुभव करते हैं।
सुख और दुःख का मिलना हमारे ही कर्मों का प्रतिफल है। सत्यता यह है कि स्वर्ग या नरक हमारे ही कर्मों से बनता है।

भारतीय संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ, वैसे संविधान सभा के 284 सदस्यों द्वारा इस पर अपने दस्तखत 24 जनवरी 1950 को ही किए गये थे। संविधान निर्माण में दो वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे।
आज से 67 वर्ष पहले जब हम समूची दुनिया पर एक महान लोकतंत्र के रूप में अपनी नई पहचान लेकर उभरे थे, तब से लेकर आज तक हजारों चुनौतियां सामने आने के बाद भी हम इस लोकतंत्र के बदौलत उम्मीदों के अनंत आकाश में नित नवीन ऊंचाईयां छूने अविराम अग्रसर हैं।
आज विश्व एक ध्रुवीय हो गई है, लेकिन हम न केवल अपने लोकतंत्र को कायम रखने में सफल रहे है, अपितु तमाम विषम परिस्थितियों के बाद भी उसे और भी परिपक्व बना रहे हैं। समूचा अंतर्राष्ट्रीय समुदाय इस सत्य को आज स्वीकारने लगी है। अब हम गरीब एवं पिछड़ेपन की संज्ञा से मुक्त होकर विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में उभर रहे हैं। विकासशील से विकसित होने की दिशा में तेजी से बढ़ रहे हैं। वैश्विक परिदृश्य में हमारी प्रभावी उपस्थिति अब किसी से छिपी नहीं है।
हमारी सफलताओं पर दृष्टिपात किया जाये तो हम पाएंगे की वर्तमान में शायद ही कोई अंतर्राष्ट्रीय मंच हमारी उपेक्षा या अवहेलना का जोखिम मोल ले सके। यह सच है कि देश के कई इलाकों की आबादी अशिक्षा, अस्वस्थता, शुद्ध जल की कमी, भूख, गरीबी, अन्धविश्वास, कुरीतियों आदि समस्याओं से जूझ रही है। और इन सबसे निपटने के लिए आगत भविष्य में हमें
काफी लंबा रास्ता तय करना है।
आइए, गणतंत्र दिवस के इस सुअवसर पर हम अपने कर्तव्यों एवं दायित्वों को समझें और संकल्प लें कि अपने संविधान निर्माताओं का स्वप्न साकार करने की दिशा में आगे बढ़ते हुए भारत को विकसित, आत्मनिर्भर तथा सामाजिक समरसता से परिपूर्ण राष्ट्र बनाने के लिए हरसंभव प्रयास करेंगे।

दिवस विशेष : मकर संक्रांति 
मीठा-मीठा पर्व मकर संक्रांति


नववर्ष के शुभागमन के साथ ही एक मीठा सा पर्व दस्तक देने लगता है, और वह है - मकर संक्रांति। मकर संक्रांति पर्व प्रतीक है शिशिर ऋतु की विदाई और हेमंत ऋतु के आगमन का। जैसे ही ठंड विदा लेने को होती है और गर्मी की हल्की आंच अपना असर दिखाना शुरु करती है, मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जाता है। 
मकर संक्रांति का धार्मिक महत्व                                          
पौराणिक मान्यता है कि सूर्य के मकर राशि में होने से मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति आत्मा मोक्ष को प्राप्त करती है। उन आत्माओं को जन्म- जन्मांतर के बंधनों से मुक्ति मिल जाती है। एक और मान्यता के अनुसार इस काल में पैदा हुआ बच्चा तेजस्वी, बुद्धिमान और दीर्घायु को प्राप्त होते है. ऐसा माना जाता है कि महाभारत काल में अर्जुन के बाणों से घायल भीष्म पितामह ने गंगा तट पर सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का 26 दिनों तक इंतजार किया था। चूंकि भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था, इसलिए वे सूर्य के उत्तरायण होने पर ही मृत्यु को प्राप्त हुए और मोक्ष को प्राप्त हुए। भारतीय संस्कृति के अनुसार सूर्य तेज, ओजस एवं गति के प्रतीक तथा अधिष्ठाता हैं। सूर्य के कारण ही हमारी धरती पर जीवन और उससे संबद्ध समस्त गतिविधियां संभव हैं।                                            
मकर संक्रांति के पर्व पर स्नान और दान और यज्ञ का विशेष महत्व है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन दिया गया दान इस जन्म में और अगले जन्म में करोड़ों गुना होकर मिलता है। संक्रांति के दिन तिल का विशेष महत्व माना गया है। इस दिन प्रात: काल जल्दी उठकर तिल का उबटन शरीर पर लगाकर तिल मिश्रित जल से स्नान करना चाहिए। तिल-गुड़ का प्रसाद लेने के बाद भोजन करें। इस दिन दान का विशेष महत्व बताया गया है। दान धर्म तो हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है, क्योंकि दान करने से लोभ, लालसा व संचय की प्रवृत्ति कम रहती है।                                               
मकर संक्रांति पर तिल-गुड़ खाने का विशेष महत्व है। तिल में तेल होने से यह अत्यंत ही कोमल होती है, इसलिए मीठे के रूप में अच्छे स्वास्थ्य के लिए तिल का प्रयोग किया जाता है। तिल- गुड़ का मिश्रण या लड्डू एक-दूसरे को खिलाया जाता है, ताकि आपसी रिश्तों में मिठास बनी रहे। यह दिन बच्चों और युवाओं के लिए कई सौगातें लेकर आता है। देश के अनेक प्रांतों में पतंग उड़ाई जाती है। अनेक जगह पतंगबाजी की कई प्रतियोगिताएँ भी आयोजित की जाती हैं। इस अवसर पर विचित्र आकार-प्रकार की पतंगें बनाकर उड़ाई जाती हैं।                                               
शुभकामना, मित्रता, उत्साह एवं उमंग का यह उत्सव जहां पूरे भारत वर्ष में धूमधाम से मनाया जाता है, वहीं विदेशों में भी जहां-जहां भारतीय मूल के लोग हैं वहां मकर संक्रांति पूरे उत्साह-उमंग के साथ मनाया जाता है।    
विशेष - सन् 2016, 2020 एवं इसके बाद प्रति चार वर्ष बाद मकर संक्रांति 15 जनवरी को आती रहेगी। यह क्रम 2044 तक चलेगा। 22 वीं सदी में प्रति वर्ष 15 जनवरी के दिन मकर संक्रांति आने लगेगी।


दिवस विशेष : SWAMI VIVEKANAND JAYANTI 
राष्ट्रीय युवा दिवस एवं स्वामी विवेकानंद जयंती  (12 जनवरी) पर विशेष :


युवा दिवस के अवसर पर युवाओं के लिए सफलता के 10 स्वर्णिम सूत्र -


-- सफलता के बारे में सोचें - आपका सोच आपके भविष्य की आधारशिला है। आप वही बनेंगे, जो आप स्वयं के बारे में सोचते है। अत: स्वयं को श्रेष्ठ, शक्तिशाली होने आदि की भावना से परिपूर्ण रखें।
-- समय के साथ चलें - जो समय के साथ चलता है, समय सदैव उसके अनुसार चलता है। समय को हमेशा नियोजित करें। प्राथमिकता के अनुरूप समय निर्धारित करें।
-- अवसरों पर नजर रखें - आपकी सफलता व विकास इस बात पर निर्भर करता है कि आप इससे संबंधित अवसरों पर नजर रखते हैं। अवसर मिलते ही बेहतर स्थिति के लिए छलांग लगाने से न चुके।
-- निरंतर प्रयासरत रहें - प्रयास विफल होते हैं, मनुष्य नहीं, और निरंतर प्रयासरत व्यक्ति ही सफलता की ऊँचाइयों को छू सकता है। आज की प्रतिस्पर्धा के दौर में किसी भी क्षेत्र में सफलता हासिल करने के लिए निरंतर प्रयासरत रहना अति आवश्यक है।
-- सफलता के लिए संघर्ष जरूरी - संघर्ष यानि विषम परिस्थितियों से जी-जान लगाकर जूझना। हमें संघर्ष से घबराना या जी नहीं चुराना चाहिए, क्योंकि संघर्ष ही सफलता का स्रोत है। हम जैसा संघर्ष करते हैं, हमारी दशा, परिस्थितियाँ और भाग्य उसी के अनुसार बनते हैं।
-- संयम से सफलता - आज अनुशासनहीनता और असंयमित आचरण असफलता का कारण सिद्ध हो रहा है, इसलिए संयमित रहना जरूरी है। याद रखें सफल वही होते हैं जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी कभी असंयमित नहीं होते।
-- जीवन को तनावमुक्त रखें - आज की तेज रफ्तार जिंदगी में तनावजनित बीमारियां लगातार बढ़ती जा रही हैं। तनाव का दुष्प्रभाव सीधे हमारे कामकाज और व्यवहार पर पड़ता है, जिससे नकारात्मकता बढ़ती है। तनाव से बचने के लिए अपने आचार-विचार और आहार-विहार संतुलित रखें। सफलता के लिए यह आवश्यक है।
-- सकारात्मक सोच सफलता की सीढ़ी - जीवन में छोटी- बड़ी समस्याओं से घिरे होने पर सकारात्मक सोच ही हिम्मत देता है और सफलता के लिए यह सोच जरूरी है। किसी भी परिस्थिति में सकारात्मक सोच सफलता की राह में ऊर्जावान बनाए रखती है।
-- सफलता चाहिए तो व्यवस्थित बनें - अस्त-व्यस्त जीवन या अस्त- व्यस्त वस्तुएं हमारी एकाग्रचितत्ता एवं सफलता को बाधित करती है। व्यवस्थित होकर आप जीवन की हर उपलब्धि हासिल कर सकते हैं।
-- सीखने की जिज्ञासा - जानना- सीखना कभी अपने काम- काज तक सीमित नहीं होना चाहिए। जहां भी सीखने का अवसर मिले जिज्ञासु भाव से इसका लाभ अवश्य लें। हर नई सीख सफलता की सीढ़ी है।