Halloween party ideas 2015

आप सभी मित्रों को महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभ कामनाएं।
भगवान भोलेनाथ आप सभी का कल्याण करें एवं सारी मनोकामनाएं पूर्ण करें।
हर हर महादेव।
जय भोलेनाथ।
ॐ नम: शिवाय।
" अकाल मौत वो मरे जो कर्म करे चांडाल का।
काल उसका क्या करे जो भक्त हो महाकाल का।।"

HAPPY MAHASHIVRATRI TO ALL MY FRIENDS.

                                      प्रेम ! अनुभूति मात्र से ही हृदय के तार झंकृत हो उठते हैं। प्रेम के बारे में जितना कहा-सुना या पढ़ा-लिखा जाए कम ही रहेगा। इसे न तो किसी पैमाने में मापा जा सकता है और न ही किसी परिभाषा में बांधा जा सकता है। कबीर साहेब ने प्रेम को बड़े ही सुंदर ढंग से परिभाषित किया है - ' घड़ी चढ़े, घड़ी उतरे, वह तो प्रेम न होय, अघट प्रेम ही हृदय बसे, प्रेम कहिये सोय।' सचमुच सच्चा प्रेम न तो पल में बढ़ता और न पल में कम होता है।
                                       वर्तमान में देखे तो प्रेम की जगह अब ईर्ष्या, स्वार्थ ने ले ली है। आज प्रेम के नाम पर 'जिस्म' को ही सब कुछ मान लिया गया है। अब कसमें-वादे निभाने के लिए नहीं बल्कि तोड़ने के लिए खाए जा रहे हैं। कवि नरेश मेहता की कविता याद आती है - 'प्रेम अब फूल नहीं फूल के चित्र जैसा हो गया है।' प्रेम में न तो अब वो विरह बची है, न वो मधुर अनुभूति, न सादगी, न कोमलता और न ही त्याग-समर्पण। बचा है तो प्रतिस्पर्धा और तन-मन पर हावी बाजार।
                                       प्रेम उपासना है, वासना नहीं। उपासना प्रेम की दिव्य अनुभूति है और वासना शरीर की तृष्णा। प्रेम में देना ही देना है ,पाना कुछ भी नहीं। जो लोग प्रेम शरीर के स्तर पर करते हैं उन्हें प्रेम की दिव्य अनुभूति कभी नहीं हो सकती, उनके लिए क्षणिक शारीरिक आनंद ही सब कुछ है। आज स्त्री-पुरुष का आकर्षण ही प्रेम की परिभाषा बनकर रह गया है, और आकर्षण भी ऐसा आक्रामकता से भरा हुआ। आज के युवा प्रेम निवेदन के बजाय प्रेम अतिक्रमण पर उतारू हैं। कानफोड़ू और चीखते-चिल्लाते द्विअर्थी  गानों पर वे ऐसे नाचते-झूमते हैं मानों वे ही प्रेम के सच्चे प्रचारक हैं।                                        विगत कुछ वर्षों में बाजारवाद की आंधी और पाश्चात्य संस्कृति ने अपनी पकड़ ऐसी मजबूत बनाई है जिसने प्रेम की परिभाषा ही बदलकर रख दी है। आज प्रेम जैसी आदर्श भावना पर बाजारवाद व राजनीति हावी है। प्रेम एक-दिनी या चंद घंटे का होकर बनावटी व हिंसक हो गया है। क्या प्रेम को समय सीमा में बांधा जा सकता है? कदापि नहीं ! क्योंकि प्रेम तो नियमित जीवन में घटने वाली महान घटना है।
                                        भारत युवाओं का देश है। युवा यानि भावनाओं से भरा हुआ। इसी भावना का लाभ आज बहुराष्ट्रीय कम्पनियां खूब उठा रही हैं। इनके जाल में उलझकर युवा प्रेम का अर्थ महज उपहारों का आदान-प्रदान, इंटरनेट, धमा-चौकड़ी और शोर-शराबे को समझ लिया है। जिस प्रेम को ये कंपनियां दिवसों के रूप में बांधकर अपना व्यवसाय दिनोंदिन बढ़ाते जा रहे हैं, उस प्रेम का निर्झर तो हमारे यहां सदियों से प्रतिपल प्रवाहमान है। प्रेम जैसे सुंदर अहसास को जिस तरह से वासना, सेक्स और अश्लील हरकतों से कलंकित किया जा रहा है वह घोर निंदनीय है।
                                         प्रेम करें, लेकिन वह हमारी संस्कृति और सभ्यता के अनुरूप हो। प्रेम में दुर्भावों की जगह आत्मीय भाव हो, उच्छ्रिन्ख्लता की जगह स्वतंत्रता हो। आज आवश्यकता है प्रेम को सच्चे अर्थों में समझकर इसकी पवित्रता बनाए रखने की, प्रेम की शाश्वत भावनावों और संज्ञाओं को अक्षुण्ण रखने की, ताकि लोगों का प्रेम के प्रति श्रद्धा एवं विश्वास युगों-युगों तक अटूट, अमिट बना रहे।



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