Halloween party ideas 2015

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन हिंदू पंचांग का नववर्ष आरंभ होता है। यह दिन विक्रमीय संवत का प्रथम दिन है। प्रतिपदा के दिन से ही बासंती नवरात्रि का शुभारम्भ होता है।
ऐसा माना जाता है कि नर्मदा नदी के उत्तर में सम्राट विक्रमादित्य ने विक्रम संवत और दक्षिण दिशा में शालिवाहन ने शक संवत का आरंभ किया, जो पंचांग के अनुसार गुड़ी पड़वा का ही दिन था। इस प्रकार प्रतिपदा के दिन से ही नव संवत और भारतीय नववर्ष की शुरुआत हुई।
चूंकि यह दिन हिंदुओं का नववर्ष है, इसलिए वे अपने घरों की सफाई करके फूलों की वन्दनवार सजाते हैं। इस दिन विशेष रुप से मिष्ठान बनाये जाते हैं।महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में प्रतिपदा का आयोजन बहुत शानदार ढंग से होता है। महाराष्ट्र में इसे 'गुड़ी पड़वा' कहते हैं और आंध्र प्रदेश में उगादि (युगादि) कहते हैं। आंध्र में तेलुगु नववर्ष भी इसी तिथि से प्रारंभ होता है।

नवरात्रि आद्य शक्ति मां दुर्गा की उपासना का महापर्व है। प्रतिवर्ष यह उत्सव चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से लेकर रामनवमी तक चलता है। चैत्र के नवरात्र को वासंती नवरात्र व आश्विन के नवरात्र को शारदीय नवरात्र कहते हैं।
हमारे शास्त्रों में दुर्गा यानि शक्ति को माता व रक्षक माना है। नवरात्रि महज नौ दिन का उत्सव नहीं बल्कि बेला है अपने अंदर सोई हुई शक्ति के जागरण का। आज सर्वत्र पाप, अनाचार, काम, क्रोध, द्वेष, दुर्भाव अपनी जड़े फैला रहा है ऐसे में नारी शक्ति ही वो जीवनदायिनी शक्ति है जो इनका संहार कर सकती है। इसी शक्ति से जग में जीवन का संचार और विकास की सतत धारा प्रवाहमान रहती है।
'दुर्गा सप्तशती' में 'दुर्गा महात्म्य' के संदर्भ प्रसंग आता है कि शुंभ निशुंभ तथा महिषासुर आदि राक्षसों के आतंक से मानव समाज थर थर कांपने लगा। इससे निजात पाने सभी देवताओं ने आद्य शक्ति भगवती दुर्गा की उपासना की।
मां दुर्गा ने इन असुरों का संहार कर जगत को इनके आतंक से मुक्ति दिलाई।मार्कण्डेय पुराण में नव दुर्गा के नाम व क्रम का उल्लेख मिलता है जिनकी नवरात्रि में आराधना करने से मनचाहे फल की प्राप्ति होती है।
तदनुसार -
प्रथम शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्म चारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कुष्मान्देति चतुर्थ्कम्।।
पञ्चम स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायिनि च.सप्तम कालरात्रि महगौरिति चाष्टमम्।।
नवम सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तितः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणेव महात्मना।।
अर्थात देवी के नौ रूप हैं जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। इनमें पहली शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चंद्रघंटा, चौथी कुष्मांडा, पांचवी स्कंद माता, छठी कात्यायनी, सातवीं कालरात्रि, आठवीं महागौरी तथा नवीं सिद्धि दात्री के नाम से प्रसिद्ध है। ये सभी ब्रह्मा द्वारा प्रतिपादित दुर्गा के स्वरूप हैं।

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गर्मियां प्रारंभ हो चुकी है और पेयजल के लिए त्राहि-त्राहि भी। पानी की महत्ता किसी से छुपी नहीं है। आज धरती पर जीवन है तो पानी की वजह से। लेकिन आज इसी पानी के लिए लोग लड़ते नजर आते हैं, कारण दिनोंदिन घटता शुद्ध पानी का स्तर।
वर्तमान में पानी के गिरते स्तर के लिए जिम्मेदार कौन है, चाहे वह जल प्रदूषण के रुप में हो या पानी की बर्बादी के रुप में हो? उत्तर है हम खुद! एक तरफ तो हम पानी का रोना रोते हैं वहीं दूसरी तरफ इसे बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ते।आज उद्योग धंधो, कारखानों व अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से निकलने वाले अपशिस्ट पदार्थों ने हमारी नदियों व अन्य जल स्रोतों का बुरा हाल कर दिया है।
नदियां आंसू बहा रही है, इनका दर्द समझने वाला कोई भी नहीं। कभी कोई प्रयास करता भी है तो सिर्फ कागजों तक।प्रदूषित जल मानव समाज पर कहर बनकर टूट रहा है। हर साल लाखों लोग जलजनित रोगों के कारण काल के गाल में समा जाते है, और जो जिंदा बच जाते हैं उनकी स्थिति बड़ी दयनीय हो जाती है। प्रदूषित जल के सेवन से तरह तरह की बीमारियां सामने आ रही है। कैंसर, त्वचा संबंधी तकलीफें दिनोंदिन बढती ही जा रही है।
आज जल दिवस के अवसर पर हम सभी को गंभीरता से सोचना होगा, जल की दुर्दशा का जिम्मेदार कौन? सवाल का जवाब हम सभी के पास है। आइये संकल्प लें अपने दैनिक कार्यों से लेकर सामाजिक कार्यों में होने वाले पानी की बर्बादी रोकें। जल को नुकसान पहुँचाने वाला ऐसा कोई भी काम न करें जिससे आने वाली पीढ़ी हमें घृणा की नजरों से देखें।
याद रखें "जल ही जीवन का दूसरा रुप है।"

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होली, न सिर्फ रंगों का पर्व, बल्कि अंतरमन से प्रस्फुटित उमंग व आनंद का इन्द्रधनुषी निर्झर...।
नीले,पीले, लाल, हरे...न सिर्फ रंग बल्कि स्मृति कोष में खिला यादों का रंग-बिरंगा महकता पुष्प...।
सच है जीवन में रंग न हो तो दुनिया कितनी बेरंग हो जाए।
आइये होली के इस पावन अवसर पर रंगों के इस निर्झर को अपने अंतराल में अविराम बहने दें और यादों के पुष्प को सदैव संजोए रखें...।
तभी होली की सार्थकता है.
होली की हार्दिक शुभ कामनाएं।


                                        अदभुत उमंग और उल्लास का रंगीला पर्व है होली। इस त्यौहार में बच्चे और जवानों के साथ-साथ बुजुर्गों के मन में भी उमंग की लहर दौड़ जाती है। यह पर्व न सिर्फ पर्व है बल्कि मन के सारे दुर्भाव व दुर्विकारों को मिटाने का बेहतर माध्यम भी है।
                                       वर्तमान भाग-दौड़ और व्यस्ततम जिंदगी में नये रंग नया रस घोलने आती है होली। इस रंगीले त्यौहार का अपना अलग ही अंदाज है और अलग आनंद है।
आइये हम सभी इन बातों का ध्यान रखें और जीवन के सारे गिले-शिकवे, दुर्भाव और बुराईयों को मिटाकर अमिट रंगों में सराबोर हो जाएं।
-- इस दिन अश्लीलता और अभद्रता के साथ होली न खेलें अन्यथा होली का सही आनंद नहीं उठा पाएंगे।
-- होली पर शालीनता बरतें।
-- बड़े-बुजुर्गों, महिलाओं का सम्मान करें। उनसे पूछे बिना रंग न डालें।
-- यदि किसी को रंगों से एलर्जी या अन्य स्वास्थ्य संबंधी तकलीफ हो तो उन्हें जबरदस्ती रंग न लगाएं।
-- होली खेलते समय महिलाओं को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। कपड़े अस्त-व्यस्त, छोटे व पारदर्शी न हो इस बात का ख्याल रखें।
-- बच्चों को सुरक्षित व प्राकृतिक रंग ही खेलने के लिए दें।
-- राहगीरों पर रंग भरे गुब्बारे न फेंके, इससे दुर्घटना घट सकती है।
-- कीचड़, ग्रीस, ऑइल, कोलतार, पेंट आदि चीजों का इस्तेमाल न करें। ये त्वचा पर हानिकारक प्रभाव डाल सकते हैं।
-- होली के अवसर पर शराब, भांग, नशे आदि के सेवन से बचें। नशे में रहकर न तो आप होली का भरपूर आनंद उठा पाएंगे, न ही आपसे जुड़े लोग।
-- इस दिन खान-पान में भी ध्यान रखें। तेज मिर्च मसालेदार व तले भुने व्यंजनों का अधिक मात्रा में सेवन न करें।


मित्रों आज होलिका दहन का पावन पर्व है।
आइये इस पर्व पर हम अपने अंदर की बुराइयों, घृणा, ईर्ष्या-द्वेष, क्रोध, वासना, लोभ, दुर्भाव,हिंसा आदि दुर्विकारों को हमेशा के लिए दहन कर दें।
अपने अन्तर्मन को पवित्र बनाएं।प्रेम, स्नेह, सौहाद्र, ख़ुशी,शांति,दया, करुणा और सहिष्णुता के रंग बिखेरें...
सभी मित्रों को मनभावन त्यौहार होली की मीठी-मीठी रंगभरी शुभ कामनाएं...
HAPPY HOLI...

HOLI ARTICLE IN HINDI

 
 रंग में पड़ जाये न भंग 
बच्चों से लेकर बड़ों सभी को होली की बेसब्री से प्रतीक्षा रहती है। हो भी क्यों ये पर्व ही ऐसा है, रंग-बिरंगा, आनंदित और उत्साहित करने वाला। जीवन में नये रंग भरने वाला। लेकिन होली के ये रंग कभी-कभी परेशानी का सबब भी बन जाते हैं।
घातक हैं ये रंग-बिरंगे रंग
होली के मौके पर लगाये जाने वाले रंगों में 70% तक मिलावट होती है। 
इन मिलावटी रंगों से आँखों में जलन व कम दिखाई देना, त्वचा में सूखापन, सिरदर्द व रक्त विषाक्तता आदि का खतरा रहता है। 
बच्चों और महिलाओं की त्वचा ज्यादा संवेदनशील होने के कारण उनके लिए ये रंग और भी खतरनाक होते हैं। कानों में रंग चले जाने पर श्रवण शक्ति को हानि पहुंच सकती है। 
आंखों पर भी विभिन्न प्रकार के रंग तात्कालिक या स्थाई विकृति पैदा कर सकते हैं। 
कुछ रंग कैंसर कारक भी होते हैं।
उड़ते गुलाल संग उडती बीमारियां
होली के दिन अत्यधिक मात्रा में उड़ाया जाने वाला गुलाल भी बहुत खतरनाक है। 
गुलाल बनाने में एसिड स्कार्लेट, रोकामाइन व पोटेशियम डाई क्रामेट प्रयुक्त किया जाता है। 
उड़ते गुलाल से नाक व सांस की तकलीफ, ब्रोंकाइटिस, अस्थमा आदि की समस्या बढ़ जाती है।
होली का पर्व आनंद व उमंग का पर्व बना रहे इसके लिए आवश्यकता है सिंथेटिक रंग,पेंट,ग्रीस, कोलतार, वार्निश,कीचड़ आदि का प्रयोग नहीं करें। 
प्राकृतिक रंगों को प्राथमिकता दें।

International Women's Day (8March)

हमारे शास्त्रों में कहा गया है जहां नारियों की पूजा होती है वहां सुख-शांति, समृद्धि का वास होता है। वहीं हिन्दी के मूर्धन्य रचनाकार मैथिलीशरण गुप्त ने कहा है - 
'अबला जीवन तेरी तो बस यही कहानी, आंचल में है दूध नयनों में पानी।'
शास्त्रों में तो नारी को ऊंचा स्थान मिला है, लेकिन व्यवहार में पुरुषों की ही सत्ता समाज में कायम रही है और नारी को तिरस्कृत नजरों से देखा गया है। आज नारियों पर जितने घिनौने अत्याचार हो रहे हैं वह किसी से छिपा नहीं है, रावण काल में भी इतना अत्याचार व दुष्कर्म नहीं हुआ होगा। 
समाचार पत्रों व चैनलों में नारी उत्पीड़न और अत्याचार के वीभत्स समाचार भरे पड़े रहते है।नारी शक्ति का सकारात्मक पहलू यह है कि जहां नारियों ने विकास के झंडे गाड़े हैं, विभिन्न क्षेत्रों में सबला के रुप में प्रतिस्थापित हुई है, वहीं दूसरा पहलू अत्यंत डरावना भी है। नारियों पर अत्याचार, हत्या, मारपीट, बलात्कार, शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना, वेश्यावृत्ति दिनोंदिन बढ़ते ही जा रहे हैं। 
इसका कारण यह भी हो सकता है कि अब नारी सशक्त होकर सामने आई है, चुप नहीं बैठी है जो पुरुष प्रधान समाज को बड़ी चुनौती लग रही है। उसे अपने अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराते नजर आते हैं।आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर हमें गम्भीरता से विचार करना है कि इस नाजुक मोड़ पर जब नारी विकास की ओर निरंतर कदम बढ़ा रही है, हम सबको उसकी सहायता करनी है। 
हमारा संविधान और कानून सभी इसके लिए प्रतिबद्ध है। आवश्यकता है सामाजिक स्तर पर विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की सोच बदलने के बड़े प्रयास करने की।
आइये इस विशेष दिवस पर प्रण लें नारी के सम्मान का, उनके विकास में सहयोग का। क्योंकि नारी से ही संसार समृद्ध, सुंदर और चलायमान है.
"नारी से जग है,नारी से सब है।... कभी न भूले हमारा अस्तित्व नारी से है... मां,बहन,पत्नी और भी अनेक रूपों में नारी महान है.नारी का सम्मान करें।"