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                                    प्रतिवर्ष 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस का राष्ट्रव्यापी आयोजन पूरे समाज को शिक्षकों की बुनियादी भूमिका के प्रति सजग बनाने के निमित्त किया जाता है. भारत में शिक्षक को गुरु कहा गया है. उसे माता,पिता और ईश्वर से भी ऊपर बताया गया है. भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य संबंध की आधारशिला पर एक अनुपम परंपरा चली आ रही है, किंतु वर्तमान समय में इसके समीकरण में काफी बदलाव आ चुके हैं. 
                                   आज शिक्षक दिवस के अवसर पर समकालीन भारत के शिक्षकों की मौजूदा स्थिति को खुली आँखों से देखने-समझने की आवश्यकता है.वैदिक काल में जहाँ शिक्षक को समाज में सर्वाधिक स्थान प्राप्त था,राजर्षिगणों,महर्षियों तथा समाज के उच्चवर्गों का प्रश्रय मिलता था, 'आचार्य देवो भव:' कहकर उनकी पूजा की जाती थी,वहीं वर्तमान समय में शिक्षा सेवा को हेय दृष्टी से देखा जा रहा है.उसको मात्र अर्थ से जोड़ा जा रहा है. आज शिक्षक जिस उपेक्षा का शिकार है उसके लिए स्वयं वह ही नहीं अपितु हमारी सरकार मुख्य रूप से जिम्मेदार है.
                                  'बुभुक्षित: किं न करोति पापम' भूखा व्यक्ति समाजोनन्ति की क्या सोच सकता है ? सरकार ने उनके उत्थान की चर्चा मात्र कागजी कार्यवाही तक सीमित रखा है. शिक्षक समाज का परिवर्तनकर्ता,क्रांतिकर्ता होता है,वही राष्ट्र को प्रगति के मार्ग पर ले जा सकता है, किन्तु आज उपेक्षा के शिकार उन्हीं शिक्षकों के प्रगति का मार्ग अवरूद्ध किया जा रहा है.आज की दिशाहीन शिक्षा पद्धति में शिक्षण संस्थान मात्र परीक्षा लेने वाली संस्थाएं भर बनकर रह गई है. न तो इनमें चरित्र निर्माण के लिए कोई स्थान है और न ही ये व्यक्ति के सही मूल्यांकन में समर्थ है.
                                      विद्यालयों का महत्व निर्विवाद होता है,लेकिन विद्यालयों की वर्तमान छवि बच्चों की दृष्टी से न तो आकर्षक रह गयी है ,न प्रेरक और न ही सार्थक। हर विद्यार्थी को अपने विद्यालय के शिक्षकों के अतिरिक्त किसी न किसी से ट्यूशन पढना पड़ता है. आज तो जैसे सफलता के लिए कोचिंग संस्थानों में गये बिना उद्धार ही नहीं होता। ऐसे परिवेश में विद्यार्थियों के लिए अपने शिक्षक- शिक्षिकाओं के प्रति आदर भाव बनाये रखना कठिन होता जा रहा है. विद्यालयों को शिक्षा के व्यवसायीकरण की आंधी ने समूल हिलाकर रख दिया है.ऐसे में शिक्षक और अभिभावकों को मिलकर शिक्षा के नाम पर बढ़ रही मुनाफाखोरी और क्रूरता का प्रतिरोध करना चाहिए।
                                       जहाँ एक ओर हमारे पारम्परिक उच्च शिक्षा केंद्र,विश्वविद्यालय अनुदान आयोग तथा राज्यों के शिक्षा आयोग नौकरशाही के लगातार बढ़ते हस्तक्षेप से क्षतिग्रस्त हो गये हैं,वहीं दूसरी ओर प्रतिभाशाली युवक-युवतियों के लिए शिक्षक बनना अब आकर्षक नहीं रह गया है क्योंकि शिक्षकों की सेवा सम्बन्धी शर्तों और पदोन्नति के अवसर प्रशासनिक सेवाओं,निजी क्षेत्रों और बहुद्देशीय कम्पनियों की व्यवस्था की तुलना में पैसा व प्रतिष्ठा दोनों ही दृष्टि में हेयतर होते हैं. जहाँ बुद्ध और कौटिल्य से लेकर राधाकृष्णन, जाकिर हुसैन और नरेन्द्र देव  तक का शिक्षक बनना भारत में सबसे बड़ा सम्मानजनक और संतोषजनक कार्य था, वहीं आज शिक्षकों को उपहास और निंदा का पात्र बनाने में नौकरशाही और नेताशाही कोई कसर नहीं छोड़ रही है.उपर्युक्त कारण तो शिक्षक के नैतिक,आर्थिक,सामाजिक,सैद्धांतिक और राजनैतिक मूल्यों के पतन में उत्तरदायी रहे ही हैं,परंतु वह स्वयं भी कम जिम्मेदार नहीं है।  
                                          जहां हमारे प्राचीन शिक्षाशास्त्री 'सादा जीवन उच्च विचार' का आदर्श रखते थे ,वहीं पर आज के शिक्षकगण विलासितापूर्ण जीवन के आदि होते जा रहे हैं.अंतत: शिक्षकों को चाहिए कि वे अपनी स्थिति,राष्ट्रनीति,छात्र आवश्यकताओं के स्वप्नों को साकार करने के लिए अपने जीवन मूल्यों, आदर्शों, परम्पराओं, मान्यताओं तथा अपनी प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति को जीवित रखने के लिए सतत प्रयत्नशील रहें।
                                        आम आदमी के भीतर बेचैनी,अशांति और तनाव की दुनिया खड़ी न कर व्यक्ति के भीतर शांति,आनन्द और ज्ञान का पुष्प खिलाने में सहयोगी बनें।'कर्म ही पूजा है' इसका विचार मन में रखकर हमारा राष्ट्र सदैव विकास के पथ पर अग्रसर होता रहे एवं विश्व में एक महान शक्ति के रूप में उभरे,ऐसा कार्य शिक्षकों को करना चाहिए।

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