Halloween party ideas 2015

KITCHEN TIPS -
Latest Kitchen Tips in Hindi
    
-- समोसे के लिए मैदा गूंथते समय मैदे में एक चम्‍मच सिरका डालें. समोसे कुरकुरे बनेंगे और तेल भी कम लगेगा .  
-- करेले की सब्जी में थोड़ा सा गुड डाल देने से कड़वाहट कम हो जाती है और स्वाद बढ़ जाता है.  
-- चावल बनाने से पहले उन्हें यदि नमक मिले पानी में भिगो कर रखा जाए तो वे सफेद बनते हैं तथा टूटने से बच जाते हैं.  
-- पूरी के लिए आटा गूंथते समय उसमें 1 चम्‍मच सूजी और 1 चम्‍मच चावल का आटा मिलाने से पूरियाँ कुरकुरेदार बनती हैं.  
-- हरे धनियाँ की पत्तियाँ चबाने से प्याज की गंध दूर हो जाती है.  
-- डोसा बनाने से पहले तवे पर थोड़ा सा नमक छिड़क कर पोछ दें. डोसा तवे पर चिपकेगा नहीं.  
-- करेले की सब्जी बनाते समय मेथी भून कर डालें, इससे कड़वापन कम हो जाएगा.  
-- दही बड़े की दाल फेटते समय थोड़ा सा चावल का आटा मिला देने से दही बड़े मुलायम और स्वादिष्ट बनते हैं.  
-- कद्दू की सब्जी बनाते समय थोड़ा सा पुदीना काट कर डाल देने से सब्जी अधिक स्वादिष्ट बनती है.  
-- किशमिश को एयरटाइट डिब्बे में बंद करके फ्रिज में रखने से ज़्यादा दिनों तक ताज़ा बने रहते हैं.
--  दोसे का घोल यदि ज्यादा खट्टा हो जाये तो 2 गिलास पानी डाल कर आधा घंटे रखें फिर ऊपर का पानी निथार कर अलग कर दें. खटास कम हो जाएगी.

Beauty Tips  
स्त्री के लिए आदर्श शारीरिक नाप -  
एक सामान्य स्त्री के लिए आदर्श शारीरिक नाप 32"-26"-34" है.  
कूल्हे व जांघों का सही अनुपात -  
कद (सेमी)    कुल्हे (सेमी)    जांघे (सेमी)  
156                86                   47  
158                87.5                51  
163                91.5                53  
168                95                   56            

Mobile Tips -  


-- ग्राफिकल वॉलपेपर Graphical WallPaper या फ्लेश वॉलपेपर Flash Wallpaper को बंद करके रखें।  
-- स्क्रीन सेवर Screen Saver बंद करके रखें।  
-- पॉवर Power, स्लीप Sleep mod ऑन करके रखें।



इन्टरनेट टिप्स -
.com - commercial organization के लिये प्रयुक्त
.net - network resources
.org - other organizations
.mil - military.
.edu - educational organizations
.gov - governmental organizations.

कम्प्यूटर टिप्स 
  
ऐसे देखें अपने कम्प्यूटर का पूरा Specification -   
-- Run में जाएँ.  
-- टाइप करें dxdiag   
-- Enter दबाएँ.     
अब आप अपने PC के सभी Specification देख सकते हैं.

                                    प्रतिवर्ष 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस का राष्ट्रव्यापी आयोजन पूरे समाज को शिक्षकों की बुनियादी भूमिका के प्रति सजग बनाने के निमित्त किया जाता है. भारत में शिक्षक को गुरु कहा गया है. उसे माता,पिता और ईश्वर से भी ऊपर बताया गया है. भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य संबंध की आधारशिला पर एक अनुपम परंपरा चली आ रही है, किंतु वर्तमान समय में इसके समीकरण में काफी बदलाव आ चुके हैं. 
                                   आज शिक्षक दिवस के अवसर पर समकालीन भारत के शिक्षकों की मौजूदा स्थिति को खुली आँखों से देखने-समझने की आवश्यकता है.वैदिक काल में जहाँ शिक्षक को समाज में सर्वाधिक स्थान प्राप्त था,राजर्षिगणों,महर्षियों तथा समाज के उच्चवर्गों का प्रश्रय मिलता था, 'आचार्य देवो भव:' कहकर उनकी पूजा की जाती थी,वहीं वर्तमान समय में शिक्षा सेवा को हेय दृष्टी से देखा जा रहा है.उसको मात्र अर्थ से जोड़ा जा रहा है. आज शिक्षक जिस उपेक्षा का शिकार है उसके लिए स्वयं वह ही नहीं अपितु हमारी सरकार मुख्य रूप से जिम्मेदार है.
                                  'बुभुक्षित: किं न करोति पापम' भूखा व्यक्ति समाजोनन्ति की क्या सोच सकता है ? सरकार ने उनके उत्थान की चर्चा मात्र कागजी कार्यवाही तक सीमित रखा है. शिक्षक समाज का परिवर्तनकर्ता,क्रांतिकर्ता होता है,वही राष्ट्र को प्रगति के मार्ग पर ले जा सकता है, किन्तु आज उपेक्षा के शिकार उन्हीं शिक्षकों के प्रगति का मार्ग अवरूद्ध किया जा रहा है.आज की दिशाहीन शिक्षा पद्धति में शिक्षण संस्थान मात्र परीक्षा लेने वाली संस्थाएं भर बनकर रह गई है. न तो इनमें चरित्र निर्माण के लिए कोई स्थान है और न ही ये व्यक्ति के सही मूल्यांकन में समर्थ है.
                                      विद्यालयों का महत्व निर्विवाद होता है,लेकिन विद्यालयों की वर्तमान छवि बच्चों की दृष्टी से न तो आकर्षक रह गयी है ,न प्रेरक और न ही सार्थक। हर विद्यार्थी को अपने विद्यालय के शिक्षकों के अतिरिक्त किसी न किसी से ट्यूशन पढना पड़ता है. आज तो जैसे सफलता के लिए कोचिंग संस्थानों में गये बिना उद्धार ही नहीं होता। ऐसे परिवेश में विद्यार्थियों के लिए अपने शिक्षक- शिक्षिकाओं के प्रति आदर भाव बनाये रखना कठिन होता जा रहा है. विद्यालयों को शिक्षा के व्यवसायीकरण की आंधी ने समूल हिलाकर रख दिया है.ऐसे में शिक्षक और अभिभावकों को मिलकर शिक्षा के नाम पर बढ़ रही मुनाफाखोरी और क्रूरता का प्रतिरोध करना चाहिए।
                                       जहाँ एक ओर हमारे पारम्परिक उच्च शिक्षा केंद्र,विश्वविद्यालय अनुदान आयोग तथा राज्यों के शिक्षा आयोग नौकरशाही के लगातार बढ़ते हस्तक्षेप से क्षतिग्रस्त हो गये हैं,वहीं दूसरी ओर प्रतिभाशाली युवक-युवतियों के लिए शिक्षक बनना अब आकर्षक नहीं रह गया है क्योंकि शिक्षकों की सेवा सम्बन्धी शर्तों और पदोन्नति के अवसर प्रशासनिक सेवाओं,निजी क्षेत्रों और बहुद्देशीय कम्पनियों की व्यवस्था की तुलना में पैसा व प्रतिष्ठा दोनों ही दृष्टि में हेयतर होते हैं. जहाँ बुद्ध और कौटिल्य से लेकर राधाकृष्णन, जाकिर हुसैन और नरेन्द्र देव  तक का शिक्षक बनना भारत में सबसे बड़ा सम्मानजनक और संतोषजनक कार्य था, वहीं आज शिक्षकों को उपहास और निंदा का पात्र बनाने में नौकरशाही और नेताशाही कोई कसर नहीं छोड़ रही है.उपर्युक्त कारण तो शिक्षक के नैतिक,आर्थिक,सामाजिक,सैद्धांतिक और राजनैतिक मूल्यों के पतन में उत्तरदायी रहे ही हैं,परंतु वह स्वयं भी कम जिम्मेदार नहीं है।  
                                          जहां हमारे प्राचीन शिक्षाशास्त्री 'सादा जीवन उच्च विचार' का आदर्श रखते थे ,वहीं पर आज के शिक्षकगण विलासितापूर्ण जीवन के आदि होते जा रहे हैं.अंतत: शिक्षकों को चाहिए कि वे अपनी स्थिति,राष्ट्रनीति,छात्र आवश्यकताओं के स्वप्नों को साकार करने के लिए अपने जीवन मूल्यों, आदर्शों, परम्पराओं, मान्यताओं तथा अपनी प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति को जीवित रखने के लिए सतत प्रयत्नशील रहें।
                                        आम आदमी के भीतर बेचैनी,अशांति और तनाव की दुनिया खड़ी न कर व्यक्ति के भीतर शांति,आनन्द और ज्ञान का पुष्प खिलाने में सहयोगी बनें।'कर्म ही पूजा है' इसका विचार मन में रखकर हमारा राष्ट्र सदैव विकास के पथ पर अग्रसर होता रहे एवं विश्व में एक महान शक्ति के रूप में उभरे,ऐसा कार्य शिक्षकों को करना चाहिए।